आजकल मै माधव गोडबोले की एक किताब “India’s Parliamentary
Democracy on Trial” “भारत की संसदीय लोकशाही की
अग्निपरीक्षा” पढ़ रहा हूँ. उसमेसे कुछ विचार राष्ट्र्हित मे मित्रों के साथ शेअर
करनेका ख़याल आया. आजकल लोगोंके पास किताबे पढनेका समय नहीं होता. सोचा कुछ महत्वकी
बाते संक्षेपमे शेअर करके राष्ट्र सेवा हो सकती है तो करलूं. किताब मे लेखक ने डॉ.
बाबासाहब आम्बेडकर के २५ नवम्बर १९४९ के दिन संविधान सभा मे दिये गए समापन भाषण के
कुछ बहोत ही महत्वपूर्ण अंश उद्धृत किये है जिसका हिंदी भावानुवाद मै यहां उद्धृत
करता हूँ.
“संविधान कितनाही अच्छा क्यों न
हो, यह निश्चित रूपसे खराब हो जाएगा
यदि इसपर काम करने वाले लोग बुरे है. और संविधान चाहे कितना भी खराब क्यों न हो,
यह बहोत ही अच्छा सिद्ध होगा यदि इस पर काम करने वाले लोग अच्छे है. संविधान का
कार्य पूर्णतया संविधान के स्वरूप पर निर्भर नहीं है. संविधान आपको शासन के अंग
जैसे की धारासभा, कार्यकारिणी और न्यायपालिका प्रदान कर सकता है. इन अन्गोंका कार्य जिन कारकों पर आधारित है
वह वे लोग और राजकीय पक्ष रहेंगे जो लोगों द्वारा अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए
साधन के रुपमे स्थापित किये जाएंगे. यह कौन कहे सकता है भारत के लोग और उनके
राजकीय पक्ष कैसा आचरण करेंगे ?”
संविधान सभाके अध्यक्ष डॉ
राजेन्द्र प्रसाद के संविधान सभाके समापन भाषण मे दी गई ठीक इसी प्रकारकी चेतावनी
भी लेखक ने इसी संदर्भमे उद्धृत की है जिसका भावानुवाद इस प्रकार है.
“संविधान मे कुछभी प्रावधान हो
या न हो, राष्ट्र का कल्याण राष्ट्रका प्रशासन कैसे चलाया जाता है इसपर निर्भर
करेगा. और प्रशासन कैसे चलेगा इसका आधार प्रशासन चलाने वाले लोगों पर रहेगा. यह कथन सुविदित है की देश को वैसी ही
सरकारें मिलेगी जिसके वो लायक है. आखिरकार संविधान एक मशीन की तरह जीवनहीन चीज़ है....यदि चुने गए
लोग सक्षम, चारित्र्यवान और इमानदार है तब वे क्षतियुक्त संविधान से भी उत्तम
परिणाम प्राप्त करेंगे. यदि उनमे इन सद्गुणों का अभाव है तो संविधान कुछ मदद नहीं
कर पाता....भारतको आज जरूरत है प्रमाणिक लोगोंके ऐसे समूह की जिनको अपनेसे ज्यादा
राष्ट्रहित प्रिय होगा.”
इन दोनों महानुभावोंके विचारोको
यदि ठीक से समजे तो तात्पर्य यही निकलता है की हमें सरकारें तभी अच्छी मिल सकती है
जब हमारे पास प्रशासन चलाने के लिए चारित्र्यवान और प्रमाणिक लोग होंगे. अब ये
चारित्र्यवान और प्रमाणिक लोग आयेंगे कहांसे ? क्या चन्द्र, मंगल या शुक्रसे
अवतरित हो कर आयेंगे ? या फिर संसद में एक और कडा कानून बनालेंगे की हर माँ बाप ने
चारित्र्यवान बच्चे पैदा करने होंगे और ऐसा कानून पारित कर लेनेसे चारित्र्यवान
बच्चे देशमे पैदा होने लगेंगे ? फिर तो उम्मीद छोड़ दो और अपने सर्वनाश की और आगे
बढ़ते रहो. ऐसा कोई शोर्टकट नहीं है. हमें और आपको स्वयम चारित्र्यवान और प्रमाणिक
बनने का कष्ट उठाना होगा तभी हमारी भावी पीढियां भी चारित्र्यवान होंगी और चैनसे
जिएगी. ऐसा मत सोचना की किसने देखा है भविष्य और भावी पीढ़ियों के बारेमे सोच कर
अभीसे क्यों चिंतित हों ? हम तो चल बसेंगे फिर आगे किसे देखना है ? हमारी संस्कृति
और सभ्यता पुनर्जन्म में विशवास करती है. तो हमारी भावी पीढियां यही आत्माएं होंगी
जो आज है. जिसे आप भावी पीढियों का भविष्य समजते है वह आपका आपना भविष्य होगा. सोच
लो और सम्हल जाओ.