Monday, February 26, 2024

तथा कथित किसान आंदोलन 02 और सर्वोच्च न्यायालय का तारीख 12-01-2021 का अंतरिम आदेश।

 

आज तारीख 25 फरवरी, 2024.

सन 2021 के जनवरी मे किसान आंदोलन चरम पर था। 26 जनवारी 2021 को लाल किले पर इन तथा कथित किसानों ने हुड़दंग मचाया। इसी दौरान भारत सरकार द्वारा संसद मे पारित तीन कृषि कानूनों पर सर्वोच्च न्यायालय मे कई सारी याचिकाएं इन कानूनों के विरोधमे और इन कानूनों के पक्ष मे भी दाखिल हुई थी। तारीख 12 जनवरी, 2021 को रिट पिटीशन क्रमांक 1118/2020 राकेश वैष्णव और अन्य विरुद्ध भारत सरकार और अन्य के साथ कई अन्य याचिकाओं पर सुनवाई करते सर्वोच्च न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश पारित किया था जिसके द्वारा उन तीन कृषि कानूनों को आगेका आदेश होने तक स्थगित किया था और सरकार और किसानों के बीच संतोषकारक समाधान ढूंढने के लिए भूपिंदर सिंह मान (प्रमुख, भारतीय किसान यूनियन) की अध्यक्षता मे एक चार सदस्यी समिति का गठन किया था।

तथाकथित किसान आंदोलन के बारेमे कुछ लिखनेका मन इसलिए बना क्यों की आजकल दिल्ली के आसपास हरियाणा, पंजाब मे फिरसे तथाकथित किसानों का ‘शांतिमय विरोध प्रदर्शन’ के नाम से भारी अर्थमूवर्स जैसे की पोकलेन, जेसीबी इत्यादि मशीन, टँकनुमा ट्रेक्टर्स के साथ हुड़दंग मचाना चालू हुआ है। ऐसेमे मुजे अपनी पवित्रताम सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन कृषि कानूनों पर तारीख 12-01-2021 को दिए गए एक अंतरिम आदेश की याद या गई और उसे गूगल पर ढूंढ के पढ़ा तो मानमे कई प्रश्न उपस्थित हुए। अंतरिम आदेश शब्द को मैंने जानबूज कर हाइलाइट किया है क्यों की ये तारीख 12-01-2021 को ‘अंतरिम”  था। इस अंतरिम आदेश द्वारा गठित समिति ने अपनी ‘अंतिम’ रिपोर्ट तारीख 19 मार्च, 2021 को सर्वोच्च न्यायालय मे एक बंद लिफ़ाफ़े मे  सादर कर दी है। आज तारीख 25 फरवरी, 2024 हो गई है, तथाकथित किसानों ने फिरसे हुँड़दंग मचाना चालू कर दिया है फिर भी हमारे पवित्रतम सर्वोच्च न्यायालय का कोई अंतिम निर्णय नहीं आया है। ना ही सर्वोच्च न्यायालय ने उस रिपोर्ट को पब्लिक किया है।      

अब हम सर्वोच्च न्यायालय के उस तारीख 12-01-2021 के अंतरिम आदेश मे क्या क्या था उसकी भी थोड़ी चर्चा करेंगे क्यों की मुजे लगता है आजके पक्षपाती मीडिया के दौर मे लोगों को खुद तथ्यों को ढूंढ कर जानना चाहिए। उस अंतरिम आदेश की लिंक मै यहाँ साझा करता हूँ। आप खुद इसे पढ़ सकते हो। 

https://main.sci.gov.in/supremecourt/2020/21097/21097_2020_31_19_25372_Order_12-Jan-2021.pdf

सबसे पहेले ऊपर दी गई लिंक खोल कर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पेरा  14 पढ लीजिए जिसमे इसके ‘अंतरिम’ होनेका उल्लेख है और इसके पीछे सुप्रीम कोर्ट की आपेक्षा ये थी की कुछ न्यायसंगत समाधान निकल आएगा। अब प्रश्न ये उपस्थित होता है की क्या कुछ न्यायसंगत समाधान निकाला जैसा की सुप्रीम कोर्ट ने आपेक्षा की थी ? यदि इसका उत्तर हाँ है तो फिर किसान टँकनुमा बख्तर लगे ट्रेकटर लेकर पंजाब और हरियाणा की सड़कों पर हुड़दंग क्यों मचा रहे है ? अच्छा, और अपनी पसंद के कुछ मामलों मे स्वतः संज्ञान लेने वाली सुप्रीम कोर्ट वर्तमान मे ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ की आड़ मे हो रहे हुड़दंग का संज्ञान ले कर वो बंद लिफ़ाफ़े मे मिली अपनी ही बनाई हुई समिति की रिपोर्ट जाहीर क्यों नहीं करती ? इस प्रश्न का उत्तर तो सर्वोच्च न्यायालय से अवश्य बनाता है।  

इस अंतरिम आदेश के पेरा 6 मे भारतीय किसान यूनियन की इंटेरवेन्शन एप्लीकेशन क्रमांक : IA 3324/2021 के संदर्भ से ‘सिख फॉर जस्टिस’ नामके एक अलगाववादी संगठन द्वारा इस आंदोलन को वित्तपोषण कीये जाने के दृढ़तापूर्ण कथन (Averment) और भारत के अटार्नी जनरल द्वारा उसके समर्थन का उल्लेख तो अवश्य किया पर स्वतः संज्ञान लेने वाले सुप्रीम कोर्टको देश की एकता और अखंडता के हितमे इस दृढ़तापूर्ण कथन (Averment) पर अपनी निगरानी मे सीबीआई या एनआईए द्वारा जांच कराने के आदेश देनेकी न्यायिक

 

 

सक्रियता वाली इच्छा क्यों नहीं हुई ? यह प्रश्न भी मेरे मनमे तो उठा और किसी सामान्य नागरिक को कुतूहल वश भी इस अंतरिम आदेश को कभी पढ़ने की इच्छा हुई भी या नहीं ये मुजे नहीं पता।

       अब इस अंतरिम आदेशके पेरा 8 को देखते है। यहाँ सुप्रीम कोर्ट कहेता है, “......कृषि संगठनों और सरकार के बीच की अबतक की बातचीत से कुछ परिणाम नहीं निकाला है इस लिए हमारे विचार मे कृषि संगठनों और सरकार के बीच बातचीत करनेके लिए एक कृषिक्षेत्र के विशेषज्ञों की समिति का गठन किया जाता है इससे एक अनुकूल वातावरण की निर्मिती होगी और किसानों के विश्वास और आत्मविश्वास मे सुधार होगा। हम इस मन्तव्य के भी है कि तीनों कृषि कानूनों को हाल के लिए स्थगित कर देना किसानों की आहात भावनाओं को  शांत करेगा और किसानोनको आत्मविश्वास के साथ बातचीत की मेज पर आनेके लिए प्रोत्साहित करेगा।“  अब आज इस अंतरिम आदेश (12-01-2024) के करीब तीन साल और एक महीने बाद सुप्रीम कोर्ट के इन मंतव्यों जिनके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने तीनों कृषि कानूनों को स्थगित कर दिया और एक समिति का गठन किया उसका आजकी वास्तविक परिस्थितियों के परिपेक्ष मे मूल्यांकन करे तो फिर वही प्रश्न उठते है। सुप्रीम कोर्ट रचित समिति ने तो सरकार और करीब 85 कृषि संगठनों से बातचीत करके निर्धारित समय सीमा मे तारीख 19 मार्च, 2021 को अपनी रिपोर्ट बंद लिफ़ाफ़े मे सुप्रीम कोर्ट को सादर कर दी।  सुप्रीम कोर्ट ने यह रिपोर्ट तीन साल तक उस बंद लिफ़ाफ़े से बहार क्यों नहीं निकली ? अब किसान तो फिर फावड़ा, कुल्हाडी , टँकनुमा ट्रेक्टर्स, जेसीबी मशीनस लेकर रोड पर हुड़दंग मचाने निकाल पड़े। तो अब क्या सुप्रीम कोर्ट की कोई जवाबदेही नहीं बनती इस बात पर ? और इस बात पर सरकार से भी तो प्रश्न बनाता है की एटार्नी जनरल सुप्रीम कोर्ट से क्यों नहीं उस बंद लिफ़ाफ़े को खोलने कहेते ? अब विवादास्पद कहे जाने वाले तीनों कानूनों को तो सरकार ने वापिस ले लिया है। बाकीकी बाते तो उस बंद लिफ़ाफ़े मे है जो अपनी पवित्रतम महान सुप्रीम कोर्ट के पास है।

अब देखते है इस अंतरिम आदेशका पेरा 12. यहाँ भारतीय किसान संघ के सीनियर काउंसेल का संदर्भ देते हुए सुप्रीम कोर्टने अपने आदेश मे उल्लेख किया है की भारतीय किसान संघ के सीनियर काउंसेल जिस किसान संगठन का प्रतिनिधित्व करते है वह संगठन कृषि कानूनों से पीड़ित नहीं है। 15 राज्यों के 15 कृषि संगठनों का प्रतिनिधित्व कर रहे Consortium of Indian Farmers Association (CIFA) के काउंसेल ने प्रार्थना  की थी की अगर इस समय कृषि कानूनों के अमल को स्थगित किया जाएगा तो इन 15 राज्यों के किसानों पर बहुत बुरा असर होगा। क्यों की ये फल और सब्जियों की खेती करते है और इस समय स्थगन आदेश से 21 मिलियन टन फल और सबजिया नष्ट हो जाएंगे। यह सुन कर आदरणीय मिलॉर्डों को कोई चिंता नहीं हुई। बस इस बात का अपने आदेश मे उल्लेख मात्र कर दिया यही कृपा समजा जाना चाहिए क्यों की अभी भी अपनी सारी कार्यवाही अंग्रेजी भाषा मे करने वाली सुप्रीम कोर्ट की मानसिकता उपनिवेशवादी ही है।

करीब 12 पीटीशनर्स और कई सारे इन्टरवेन्शन याचिकाकर्ताओं को सुन कर सुप्रीम कोर्ट ने जो अंतरिम  आदेश किया है वो पेरा 14(i) से 14(iii) मे है।

पेर 14(i) : तीनों कृषि कानूनों को अगले आदेश तक स्थगित कर दिया। (इस आदेश को तीन साल हो गए है और अबतक इस पर कोई अगला आदेश होने की खवर मैंने नहीं सुनी है। और पंजाब के तथा कथित किसान फिर रोड पर उतार आए है। सरकार को निष्फल मान कर सुप्रीम कोर्ट ने एक समिति का गठन कर इस समस्या को सुलजानेका दायित्व अपने ऊपर लिया था तो अब सुप्रीम कोर्ट चुप क्यों है? )

पेर 14(ii) : तीनों कृषि कानूनों को स्थगित करने के परिणामस्वरूप ये नए कानून अस्तित्व मे आनेसे पहेले जो MSP व्यवस्था अस्तित्वमे थी वही अगला आदेश होने तक अमल मे रहेगी। अब इस आदेश को मै आपनी सामान्य बुद्धि से जैसे समजता हूँ उस हिसाब से तो सरकार एमेसपी पर किसानों से कोई बात कर ही नहीं सकती और ऐसा करना कोर्ट की अवमानना ही होगी। 12-01-2021 के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कोई अगला आदेश किया हो ऐसा तो कहीं सुना/पढ़ा नहीं है। तो फिर सरकार को इस आदेश के अनुसार पुरानी एमएसपी व्यवस्था को चालू रखना है। फिर भी खबरें यह आ रही है की किसान आंदोलन-02 के नेताओं को कृषीमंत्री और पीयूष गोयलजी एमएसपी पर अलग अलग फॉर्मूले ऑफर कर रहे है। अब तो किसान आंदोलन-02 के नेताओं को सरकार ने मात्र इतना ही कहेना चाहिए की आपकी समस्या का समाधान सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति के  लिफ़ाफ़े मे बंद रिपोर्ट मे  सुप्रीम कोर्ट के पास है। मेरी नजर मे तो सरकार अब एमएसपी पर कोई बात या निर्णय नहीं कर सकती क्यों की इस पर तो अब सुप्रीम कोर्ट को ही समिति की लएफाफेमे बंद रिपोर्ट जो उसे 19 मार्च 2021 को मिली है उसे खोल कर कुछ अंतिम निर्णय देना है।

  पेरा 14(iii) : इसमे श्री भूपिंदर सिंह मान, नेशनल प्रेसीडेंट, भारतीय किसान यूनियन की अध्यक्षता मे चार सदस्यों वाली समिति के गठन का आदेश है। और इस समिति को आदेश दिया है की वो सरकार और सारे कृषि संगठनों के प्रतिनिधिओं को सुन कर अपनी रिपोर्ट अपनी सिफारिशों के साथ कमिटी की पहेली बैठक के दो माहीनों के अंदर सुप्रीम कोर्ट को सादर करेगी और कमिटी की पहेली बैठक आजसे यानि 12-01-2021 से ठीक 10 दिन के अंदर करनी होगी।

इस पेरा 14(iii) से यह एकदम स्पष्ट हो जाता है की अब जो भी करना है वह सुप्रीम कोर्ट को ही करना है। आब इन आंदोलनकारियों को अपनी मांगों को लेकर जो भी धरना प्रदर्शन करना है वह तो सुप्रीम कोर्ट के विरुद्ध ही करना चाहिए क्यों की इस अंतरिम आदेश से इस समस्या का समाधान खोजने का दायित्व तो सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से छिन कर स्वयं अपने सर ले लिया है। और फिर इस हेतु से रचित समिति की रिपोर्ट भी तो 19 मार्च 2021 से सुप्रीम कोर्ट के पास पड़ी है।   

ये मेरे विचार है और मुजे लगता है की जागरूक नागरिकों ने सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश की बारीकियों को राष्ट्रहितमे  जानना चाहिए।

यशोधर वैद्य

राष्ट्र सर्वोपरि।