Monday, November 18, 2024

मीडिया संशय के कीडेको कैसे जीवित रखता है ?

 

    १४ नवंबर २०२४ को आजतक के वेब पेज पर एक खबर पढ़ी। खबर यह थी की एक सैयद शुजा नाम की व्यक्ति अमेरिकी रक्षा विभाग की तकनीक का उपयोग करके इवीएम हैक करने का दावा कर रहा है। महाराष्ट्र के २० नवंबर २०२४ को होने वाले चुनावों मे ५३ करोड़ मे ६३ सीटों के EVM हैक करनेका ऑफर दे रहा है।

    इस खबर मे इस व्यक्ति के तीन दावों की बात है। (१) वह अमेरिकी रक्षा विभाग की तकनीक उपयोग मे ले कर इवीएम हैक कर सकता है। (२) वह अमेरिकी रक्षा विभाग मे कॉन्ट्रेक्ट पर काम कर रहा है। (३) वह यानि ये शुजा २००९ से २०१४ तक इलेक्ट्रॉनिक कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (इसीआइएल) मे काम कर रहा था। २०१४ के लोकसभा चुनावों मे उपयोग मे ली गई इवीएम मशीन विकसित करने वाली टीम मे उसने काम किया है। आजतक की यह हिन्दी रिपोर्ट तो ठीक है क्यों की इस रिपोर्ट के अंत मे यह स्पष्ट हो जाता है की यह सारे दावे जूठे थे। पर यही खबर जब मैंने कुछ अंग्रेजी वेब पेज पर पढ़ी तो यह स्पष्ट हो रहा था की वे पाठकों के मन मे संशय का कीड़ा जीवंत रखना चाहते थे जब की १४ नवेम्बर के बाद इस खबर को कोई महत्व नही मिला। सुशिक्षित वर्ग को मूर्ख बनाने के लिए अंग्रेजी माध्यम ही सही है। यह वर्ग अपने आप मे व्यस्त और मस्त रहेता है और उसकी विशेषता यह है की उसके पास समय की बहुत ही कमी होती है।  

    शुजा के दावों की खबर पढ़ कर मेरे मन मे एक विचार आया की चलो देखते है शुजा इसीआइएल मे काम करता था या नही इस पर अगर गूगल पर सर्च करते है तो क्या मिलता है? गूगल करते ही मेरी नजर मे आई बिझनेस स्टैन्डर्ड की हेड लाइन, “EVM hacking row: Syed Shuja was never with us, claims ECIL” यह खबर २२ जनवरी २०१९ की है। यह हेड लाइन पढ़ते ही मेरे मन मे पहला प्रश्न यह उठा की ECIL क्लैम यानि दावा क्यों करेगा भाई ? क्लैम यानि दावा तो सच्चा या जूठा- कुछ भी हो सकता है। ECIL तो अपने कर्मचारियों के विषय मे उनके पास उपलब्ध रेकॉर्ड के आधार पर तथ्य बताएगाना ? अब आगे जब मै हेडलाइन से नीचे की कंटेन्ट पढ़ना चालू करता हूँ तो यह लिखा मिलता है। “The Electronics Corporation of India Limited (ECIL) said that Cyber expert Syed Shuja has neither been on the rolls of ECIL nor has been in any way associated with the design  and deployment of the EVMs.”  अब देखिए हेडलाइन का ‘claims’ नीचे कंटेन्ट मे आते ही said हो जाता है। क्या ‘claim’ और ‘said’ का अर्थ एक ही होता है ? यह हेडलाइन का ‘क्लैम’ रिपोर्ट की कंटेन्ट मे ‘सैड’ क्यों हो जाता है ? मात्र हेडलाइन पढ़ने वाले अंग्रेजी सुशिक्षित मूर्खों के मन मे संशय का कीड़ा जीवित रखने के लिए। मनुष्य की समझ मे भी ना आए ऐसे उसके अर्ध चेतन मन से खेलने का बढ़िया प्रयोग है यह। और मीडिया बड़ी कुशलता से इस तकनीक का प्रयोग करता है।        

    फिर इसके आगे ये घुमाफिरा के ECIL का प्रेस रिलिझ शब्दशह जस का तस छापते है जो इस प्रकार है। “On self-styled US – based Cyber Expert Syed Shuja claiming that he worked in ECIL between 2009-14, it is certified  from records that has neither been on rolls of ECIL as a regular employee nor was he in any way associated in design and deployment of EVMs”

    अब देखिए इनके पास ECIL का प्रेस रिलिझ पहेले से उपलब्ध था जो अपने रेकॉर्ड के आधार पर प्रमाणित करता है की सैयद शुजा ना तो उनके इम्प्लॉइ रोल पर था ना ही वो EVM की डिझाइन या उसके डिप्लॉइमन्ट यानि परिनियोजन से जुड़ा हुवा था। मेरी नझर मे इस खबर की सच्ची और प्रामाणिक हेडलाइन होती, “Syed Shuja was never employed with uscertifies ECIL. पर नही। ये ऐसा नही करेंगे। क्यों की ये जानते है ज्यादातर लोग हेडलाइन पढ़ कर ही खबर के विषय मे अपना मन बना लेते है और क्लैम शब्द पाठक के मानो मस्तिष्क पर जो चित्र अंकित करता है वह और certifies शब्द जो चित्र अंकित करता है उसमे बहुत बड़ा अंतर है। क्लैम शब्द संशय के कीड़े को जीवित रखता है और certifies शब्द संशय निरस्त कर देता है। इन्हे आपको आशंकित रखना है क्यों की इन्हे एंटी एस्टैब्लिश्मन्ट  होने का एजंडा चलाना है। इन्हे प्रो ट्रुथ होनेसे कोई मतलब नही है।

    यदि मूर्ख नही बनना है तो खबरे मात्र पढिए मत, खबरों का पोस्टमॉर्टम किया कीजिए।   

 

 

Friday, October 25, 2024

जलवायु कार्यकर्ता (Climate Activist) सोनम वांगचुक द्वारा आयोजित दिल्ली चलो पदयात्रा और अनशन – वैकल्पिक दृष्टिकोण

 

    सोनम वांगचुक लद्दाख के लिए मुख्यतः चार मांगों को लेकर एक आंदोलन चला रहे है। यद्यपि सरकार द्वारा उनसे डिसेम्बर मे बातचीत के लिए  दिए गए आश्वासन के बाद फिलहाल वे अनशन छोड़ कर वापस चले गए है। उनकी मांगे इस प्रकार है (१) लद्दाख को राज्य का दरज्जा (२) लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची मे रखना यानि लद्दाख को ट्राइबल स्टेटस देना (३) स्थानिकों के लिए रोजगार के अवसर प्रदान करना और (४) लद्दाख के लिए एक और संसदीय सीट बढ़ाने की मांग।

       मेरी दृष्टि मे लद्दाख को राज्य का दरज्जा देने की मांग, रोजगार के अवसर की मांग और संसदीय सीट बढ़ाने की मांग योग्य है उसमे कुछ बहोत हानिकारक नहीं लगता। राज्य को छठी अनुसूची मे रखने की मांग पर गंभीरता से विचार की आवश्यकता है। ट्राइबल स्टेटस देकर रोजगार के अवसर देना कितना सहज सरल होगा यह भी सोचने वाली बात है क्यों की विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के बिना रोजगार के अवसर निर्माण नहीं हो सकते और ट्राइबल स्टेटस जलवायु संरक्षण के नामसे किसी भी विकास योजना को बाधित करने के लिए पर्याप्त कारण बन सकता है। सोनम वांगचुक एक बहुत ही सच्चे अच्छे व्यक्ति हो सकते है। हो सकता है उनके द्वारा कीये गए बहुत सारे कार्य बहुत ही अच्छे हो। पर ये इस बात की गारंटी नहीं है के वे जो भी करते है सब सही और अच्छा ही हो। यह तर्क मात्र सोनम वांगचुक के लिए ही नहीं है, कोई चाहे कहीं भी उपयोग कर सकता है शर्त इतनी ही है की वह प्रमाणों के साथ हो। एक अच्छा, सच्चा व्यक्ति अनचाहे और अंजानेमे ही किसी विदेशी संस्था का टूल बन गया हो इस संभावना को पूर्णतया नकारा नहीं जा सकता। ऐसा है या नहीं इसकी जांच पड़ताल करने के साधन किसीभी देश मे मात्र सरकार के पास ही होते है और इस विषय मे सामान्य नागरिक को सरकार पर ही विश्वास करना पड़ता है।

         रेमोन मेगसेसे अवॉर्ड विजेता जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन,  लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमक्रैटिक अलाइअन्स जैसे संगठनों द्वारा आयोजीत इस आंदोलन को समजने के लिए रेमोन मॅगसेसे कौन थे और किस देश से थे, उनके नाम पर अवॉर्ड किस देश ने और उस देश की किन संस्थाओं ने स्थापित किया उस इतिहास को जानना आवश्यक है। साथ साथ भारतीय संविधान की छठी अनुसूची क्या है, किसी राज्य या प्रदेश को इस सूची मे रखने के परिणाम क्या हो सकते है, खास करके ऐसा राज्य या प्रदेश जिसकी सीमा चीन जैसे दुश्मन देश की सीमा से जुड़ी हो, यह जानना और समझना भी जरूरी है। इसके उपरांत लद्दाख की सीमा से लगे चीन के प्रदेश तिब्बत मे चीन धड़ल्ले से और तेज गति से जो विकास कर रहा है वो और उससे होने वाले जलवायु प्रदूषण को जानने और समझने की भी जरूरत है।   

रेमोन मेगसेसे अवॉर्ड 

       रेमोन मेगसेसे फिलिपाइन्स के प्रेसीडेंट थे। 1940-1950 के दरमियान फिलिपाइन्स मे भूमिहीन किसानों की जमींदारों के विरुद्ध एक कॉम्युनिस्ट गुरिल्ला मूवमेंट चल रही थी। इस मूवमेंट को कुचलने के लिए अमरीकी सीआईए ने 1953 मे रेमोन मेगसेसे को फिलिपाइन्स के प्रेसीडेंट का चुनाव जितवा कर सत्ता पर प्रस्थापित करवाया। और 1957 मे रेमोन मेगसेसे एक विमान दुर्घटना मे मारे गए। उनकी स्मृति मे न्यूयॉर्क स्थित रोकफ़ेलर ब्रदर्स फंड ने रेमोन मेगसेसे अवॉर्ड की स्थापना कि। बाद मे सन 2000 मे फोर्ड फाउंडेशन ने ‘रेमोन मेगसेसे इमर्जेंट लीडरशिप अवॉर्ड’ की स्थापना की। ये दोनों ही संस्थाएं अमेरिकन है। रेमोन मेगसेसे फिलीपीन्स के थे। ये दोनों अमेरिकी संस्थाएं विदेशों मे अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए काम करने के लिए जानी जाती है। शृंखला के बिन्दु जोड़ने से इतना तो पता चल ही जाता है की रेमोन मेगसेसे अवॉर्ड के पीछे दो अमेरिकी संस्थाएं, रोकफ़ेलर ब्रदर्स फंड और फोर्ड फाउंडेशन है और इन दो संस्थाओं के पीछे अमेरिकी जासूसी संस्था सीआईए है। तो मै एक सजग नागरिक के नाते ऐसा अवश्य सोचूँगा की अच्छे हेतु की चाशनी मे लपेट कर रेमोन मेगसेसे अवॉर्ड मूलतः अमेरिकन हितों की रक्षा के हेतु ही दिया जाता है। फोर्ड फाउंडेशन और सीआईए के संबंधों के विषय मे ब्रिटिश पत्रकार और इतिहासकार Frances Stonor Saunders की पुस्तक Who Paid the Piper ? CIA and The Cultural Cold War पर्याप्त प्रमाण है। जो पाठक सीआईए और फोर्ड फाउंडेशन के विषय मे वास्तव मे प्रमाण देखना चाहते है उनके लिए बिंगहमटन यूनिवर्सिटी के सोशयोलॉजी के रिटायर्ड प्रोफेसर के 2001 के आर्टिकले की लिंक यंहा देता हूँ। पढिए। https://www.ratical.org/ratville/CAH/FordFandCIA.pdf मेगसेसे अवॉर्ड के पीछे कैसे सीआईए और अमेरिकन हितों की रक्षा का हेतु है यह समझने के लिए इतनी सामग्री पर्याप्त है।

किसी राज्य या प्रदेश को संविधान की छठी अनुसूची मे रखने के नकारात्मक परिणाम क्या होते है ?   

       वर्तमान मे भारत के चार राज्य असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम छठी अनुसूची मे है। इसके प्रावधान भारतीय संविधान मे स्थापित सिद्धांतों से विपरीत है। किसी राज्य या प्रदेश को छठी अनुसूची मे रखानेसे उसे ट्राइबल स्टेटस मिलता है। पर इसका एक परिणाम यह भी होता है की एससे संविधान के समानता के मूलभूत अधिकार (अनुच्छेद 14) का उलँघन होता है। इससे आदिवासी और गैर आदिवासी के बीच भेदभाव होता है जो अनुच्छेद 15 का उलँघन है। अनुच्छेद 19 हर भारतीय को भारत मे कहीं भी निवास करनेका, रोजगार प्राप्त करनेका अधिकार देता है। प्रदेश को ट्राइबल स्टेटस मिलानेसे अन्य राज्य/प्रदश के निवासियों का यह अधिकार भी छिन जाता है। जो राज्य छठी अनुसूची के अन्तर्गत है वहाँ यह स्टेटस आदिवासी और गैर आदिवासीयों के बीच लंबे संघर्ष और दंगों का कारण रहा है। मेघालय के 1972 और 2011 के जनगणना के आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है की मेघालय मे गैर आदिवासियों की जनसंख्या मे गिरावट आई है। 1972 मे मेघालय मे गैर आदिवासी 20 प्रतिशत थे जो 2011 मे घट कर 14 प्रतिशत हो गए। छठी अनुसूची के कारण जिला प्रशासन और स्थानिक इकाइयों को ज्यादा स्वायत्तता मिलती है जिसके कारण विधान सभा और जिला प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति बनी रहती है। छठी अनुसूची के अंतर्गत जिला परिषदे भूमि और वन संबंधी अपने कायदे बना सकती है। ऐसी स्वायत्तता राज्य और केंद्र सरकार को आंतरराष्ट्रीय सीमा पर वयहात्मक दृष्टि से जो विकास करना आवश्यक है उसमे बाधा बन सकती है। इन सभी बातों को अनदेखा करके लदाख को छठी अनुसूची मे रखने की मांग को स्वीकार करना राष्ट्रीय सुरक्षा को हानिकारक हो सकता है।

विकास की गतिविधियों से जलवायु प्रदूषण और चीन द्वारा लदाख सीमा से लगे चीन नियंत्रित प्रदेश मे धड़ल्ले से हो रहा विकास।           

       लदाख की सीमा को लगा कर पूर्व मे चाइनीझ तिब्बत आटोनॉमस रिजियन और अक्साइ चीन है। चीन अपनी 1999 की ‘Go waste campaign’ नीति के अंतर्गत तिब्बत मे धड़ल्ले से और तेज गतिसे विकास कर रहा है। इस चीनी विकास से भी तो प्रदूषण होता होगा, ग्लेसियर्स पिघलते होंगे। लदाख के उस पार चीन द्वारा हो रहे विकास की तुलनामे भारत तो अभी शुरुआत कर रहा है। और ऐसी कोई व्यवस्था है क्या की जिसके कारण चीनी विकास के फल स्वरूप हो रहा प्रदूषण भारतीय सीमा मे स्थित लद्दाख मे जलवायु प्रदूषण से कोई नुकसान ना कर पाए ? जलवायु प्रदूषण को दूसरों की सीमा मे प्रवेश के लिए वीजा की जरूरत होती है क्या ? क्या हम ऐसा स्टेंड ले सकते है की चीन अपनी तरफ भले ही कुछ भी करता रहे, उससे जो भी जलवायु प्रदूषण होना है होता रहे, हम संत बने रहेंगे ?

       अब तिब्बत मे चीन के विकास की गति को देख लेते है। 1959 मे तिब्बत मे टोटल रोड नेटवर्क 7300 की मी था, जो 2022 तक बढ़ कर 1,20,000 की मी हो गया। चीन की दसवी पंचवर्षीय योजना मे तिब्बत मे इन्फ्रस्ट्रक्चर डेवलपमेंट के 117 प्रोजेक्ट्स के लिए 4.2 बिलियन डोलर्स इन्वेस्ट कीये थे। ग्यारहावी पंचवर्षीय योजना मे 188 इन्फ्रस्ट्रक्चर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के विकास के लिए 21 लाख बिलियन डोलर्स इन्वेस्ट कीये थे। वर्तमान मे चालू चौदहवी पंचवर्षीय योजना मे 2021 से 2025 की अवधि मे तिब्बत मे इन्फ्रस्ट्रक्चर डिवेलपमेन्ट के लिए अंदाजन 30 बिलियन डोलर्स खर्च करने का निश्चय किया है। इसके उपरांत दक्षिण जिनजियांग और तिब्बत मे 12 कार्यरत एयरपोर्ट के आलाव और 30 नए एयरपोर्ट विकसित करने की चीन की योजना है। तिब्बत मे 628 गाँव विकसित करने की योजना है। इन आंकड़ों का सोर्स सेंटेर फॉर जॉइन्ट वॉरफेर स्टडीस की वेबसाइट पर प्रसिद्ध कर्नल विवेक सिंघ का आर्टिकल है जिसकी लिंक संदर्भ हेतु यहाँ शेर करता हूँ।  https://cenjows.in/chinas-infrastructure-development-along-the-line-of-actual-control-lac-and-implications-for-india/  

       भारत सरकार और हर भारतीय नागरिक ने इस विषय पर इमोशनली नहीं पर लॉजिकाली और स्ट्रेटेजीकली विचार करना होगा।

यशोधर वैद्य

25-10-2024

Tuesday, June 25, 2024

इमरजेंसी यानी की आपातकाल मैने देखा है।

             25 जून 1975 के दिन जब इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने भारत मे इमरजेंसी घोषित की तब मै ठीक 20 साल का था और मेरी पुलिस ट्रेनिंग के अंतिम तबके मे था। जुलाई 1975 मे मेरी तालीम पूरी हुई। एमरजेंसी भी एकदम से ताजा ताजा और हम भी एकदम से ताजा ताजा डंडा हाथमे आए पुलिस वाले। हम गुजरात के भावनगर जिले मे थे। उस कालखंड के हमारे उत्साही एस पी साहब की निगरानी और आदेशों के अंतर्गत हफ्ते/महीने मे एखाद बार क्रिमिनलो के गले मे उनकी क्राइम हैबिट्स की तख्तियां लटका कर शहर की सड़कों पर उनका जुलूस निकाला करते थे। सच कहूं तो तब मुझे इमरजेंसी बहुत अच्छी लगी थी। सत्ता का एक अवर्णनीय नशीला सा आनंद मिलता था। डेमोक्रेसी जैसे शब्द मस्तिष्क से मिलों दूर थे। ये तो हुई मेरी बात। पर साधारण जन समुदाय भी खुश था क्यों की MISA (Maintenance of Security Act) जैसे कठोर कानून, पुलिस और सत्ता के डर से एक डिसिप्लिन का माहौल बना था। आम तौर पर लेट चलने वाली रेल गाड़ियां समय से चलने लगी थी। साधारण लोगों के लिय तो यही छोटी छोटी खुशियां महत्व की थी। विजया राजे सिंधिया, जयप्रकाश नारायण, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंघ यादव, राज नारायण,  मोरारजी देसाई, ज्योर्ज फर्नांडिस, अटल बिहारी वाजपेई, लालकृष्ण आडवाणी, चौधरी चरणसिंघ, अरुण जैटली जैसे विपक्ष के बड़े बड़े नेताओं को मीसा के अंतर्गत जेल मे डाल कर संविधान के प्रिएंबल मे सेक्युलर और सोश्यालिस्ट शब्द घुसेडने को सच्ची तानाशाही कहते है ये छोटी छोटी खुशियों मे ही प्रसन्न रहने वाली साधारण जनता की समझ से परे था और आज भी पता नहीं जनता ठिकसे समझ पाई है या नही ! बीस साल की उत्साही युवावस्था मे इन सब चीजों के जनतंत्र पर होने वाले घातक परिणामों से हम भी अनभिज्ञ थे।

       आज मेरी उम्र 70 साल है। और जब पीछे मुड़ कर भूतकाल में देखता हुं तो विधि की वक्रता और कांग्रेस बीजेपी से भी बड़ी वॉशिंग मशीन है यह समझ मे आता है। अठारहवी लोकसभा की सांसद (एमपी) मीसा भारती का नाम मीसा क्यों है ? क्यों कि मिसाजी के पिताश्री लालूजी इंदिराजी की कांग्रेस द्वारा देश पर थोपी गई  इमरजेंसी के दौरान मेंटेनेंस ऑफ इंटर्नल सिक्योरिटी ऐक्ट (मिसा) के अंतर्गत जब जेल मे थे तब मिसाजी का जन्म हुआ इसलिए उनका नामकरण मीसा हुवा। अब उस कालखंड मे जो लालूजी इंदीराजी की सरकार की नजर मे भारत की आंतरिक सुरक्षा को खतरा थे वे और उनकी बेटी/बेटे कोंग्रेस के साथ जुड़कर धूल के साफ सुथरे होकर आज भारत और भारत के संविधान के रक्षक बन गए ! जो मुलायमसिंघ यादव २५ जून १९७५ ले कर २१ मार्च १९७७ के दौरान इंदिराजी की कॉंग्रेस सरकार की नजर मे देश की आन्तरिक सुरक्षा के लिए खतरा थे उनके सुपुत्र कॉंग्रेस के साथ मिलकर अच्छी तरह कॉन्ग्रेसी डिटर्जेंट से धूल कर इस नए युग मे भारत के संविधान के रक्षक बन गए है। इसे कहेते है नेरटिव यानि कथानक। ये नेरटिव गढ़ने वाले इंटेलेकचयूअल्स भीख मांगने के कटोरे को अक्षय पात्र सिद्ध करने मे माहिर होते है। एक साधारण व्यक्ति जो की देश का नागरिक और चुनाव परिणामों मे आती महत्व का घटक ऐसा मतदाता भी होता है उसके लिए सुबह उठाना, फ्रेश होकर चाय नाश्ता करके काम पर निकाल जाना, शाम को थके हारे घर लौट कर डिनर करके सो जाना इसीमे जिंदगी सिमट जाती है। अब इस सर्व साधारण व्यक्तिको अप्लीकेशन ऑफ माइन्ड जैसी प्रकृति प्राप्त शक्ति का प्रयोग कर देश दुनिया मे हो रही घटनाओंको ठिकसे समझ लेने की फुरसत नहीं है तो वो मीडिया, सोश्यल मीडिया पर उपलब्ध खरा खोटा नेरटिव चाय नाश्ता, लांच या डिनर के साथ निगल लेता है और उसका उसके मानस पर प्रभाव भी रहेता है।

        मेरे ईमर्जन्सी के अनुभव की बात करते करते मै नेरटिव की बात पर क्यों आ गया ? क्यों की जनतंत्र की तंदूरस्ती वोट के टॉनिक से अच्छी रहती है और सर्व साधारण नागरिक का वोट करने का निर्णय नेरटिव से प्रभावित होता है। वोट दोधारी तलवार है। इसीसे डिमाक्रसी पोषित होती है और कभी इसीसी से ही यानि वोट से ही इसका घात होगा। यदि डिमाक्रसी बचानी है तो साधारण व्यक्ति को ही अपनी रोजमर्रा की दिनचर्या से ऊपर उठ कर सच्चे और जूठे नेरटिव की पहचान करने के लिए अप्लीकेशन ऑफ माइन्ड यानि अपने मस्तिष्क के उपयोग का कष्ट उठाना ही होगा वरना आखिर पछताना भी तो इसी साधारण व्यक्ति को ही पड़ेगा। किसी पार्टी के आय टी सेल पर निर्भर मत रहेन। भारत मे अपना हाथ जगन्नाथ ऐसी उक्ति प्रचलित है।   

       

Thursday, June 6, 2024

हिंदुत्ववादी राजकीय पक्ष के हिंदुत्ववादी विकल्प की अनुपस्थिति मे एकमात्र उपलब्ध विकल्प को दंडित करनेका मतदाताओं का मूड और उसके दूरगामी परिणाम।

 

        २०२४ के लोकसभा चुनाव अभी अभी सम्पन्न हुए है और इस चुनाव मे एनडीए ४०० पार और बीजेपी स्वतंत्र रूपसे ३७० पार का लक्षयांक भी था और आपेक्षा भी थी। हालांकि परिणाम लक्षयांक और आपेक्षा से बहुत काम आया। हर चुनाव के बाद परिणामों का पोस्टमॉर्टम होता है की ऐसे परिणाम क्यों आए ? जो भी और जैसे भी परिणाम आते है उसके पीछे कई कारण होते है उसमे सत्य, तथ्य, अर्धसत्य, आभासी सत्य और जूठ सबकुछ होता है। पर इस मंथन से कुछ बातें उभर कर सामने आती है जो अच्छे बुरे परिणामों के लिए कारणीभूत मानी जाती है।

       अभी सम्पन्न हुए चुनावों मे जो बीजेपी को घाटा हुआ है उस पर अब हो रहे मंथनमे जो खास  कारण सामने आते है वे मुख्यतः तिकीटों के बटवारे को लेकर कार्यकर्ताओं मे नाराजी, गरमी और शादी ब्याह की सीझन के कारण खासकर हिन्दू मतदाताओं का मत देने नही जाना, मतदान दिवस के लिए सोमवार शुक्रवार के चयन के कारण मौज मस्ती मे रहेने वाले हिन्दू मतदाताओं की मतदान के प्रति उदासीनता वगैरा वगैरा। इसके उपरांत कई और कारण भी होंगे और हो सकते है।

       जब कोई राजकीय पक्ष अपने समर्थक मतदाताओं की आपेक्षाओं पर खरा नही उतरता तब जनतंत्र मे मतदाता को अपने मत की शक्ति से उसे दंडित करने का पूरा अधिकार है। पर भारत जैसे जनतंत्र मे शर्त यह है की उसके पास उसकी धार्मिक सांस्कृतिक विचारधारा को अक्षुण रखकर उसकी आपेक्षा पुरी करने वाला दूसरा विकल्प उसके पास हो। कुछ समय पहेले मैने शिवसेना को ऐसे विकल्प के रूपमे उभरनेकी आशा की थी। पर हिंदुओं के दुर्भाग्यसे शिवसेनामे ऐसे दुरदृष्टा नेतृत्व के अभावमे पक्ष मात्र परिवारवादी आकांक्षाएं और प्रदेशवाद मे सिमट कर रहे गया। अब हिंदुत्ववादी हिन्दू मतदाता के लिए समस्या यह है की उसके पास बीजेपी को छोड़कर दूसरे हिंदुत्ववादी राष्ट्रीय पक्ष का विकल्प उपलब्ध नही है। ऐसे मे वो जब उचित/अनुचित किसी भी कारणवश अपने पास उपलब्ध एक मात्र विकल्प को दंडित करता है तब वह स्वयं को भी उस दंड का भोगी बना लेता है और विरोधी ताकतों को अनचाहे ही प्रबल बना देता है। बीजेपी के समर्थक मतदाताओं मे से कुछ मतदाताओं की और कुछ कार्यकर्ताओं की उनकी अपनी कुछ आपेक्षा भंग, नाराजी के कारण बीजेपी और उसके नेतृत्वको दंडित करने की धुनने बीजेपी और उसके नेतृत्व के प्रभाव को सीमित कर दिया है। मै कुछ मतदाता और कुछ कार्यकर्ता इसलिए कहे रहा हूँ क्यों की अगर सब वैसा ही करते तो बीजेपी को २४० सीटें भी नही मिलती।

       बीजेपी के हर समर्थक यानि वे भी जिन्होंने इसबार बीजेपी और उसके नेतृव का घमंड उतारने की अपनी ताकत का परिचय दीया है उनकी भी यह इच्छा प्रबल है की बीजेपी इस भारत भूमि की मूल संस्कृति, सभ्यता और धर्म को उसकी भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित करने का काम करे। और इसी दिशामे करने वाले काम ही मुश्किल है जिसे करने के लिए एक सशक्त सरकार चाहिए जो की २०१९  से २०२४ मे थी और २०२४ से २०२९ मे भी चाहिए थी। पर उसे अब बीजेपी के समर्थक वर्ग ने ही पूर्ण बहुमत न देकर गठबंधन की सीमाओं मे बांध दिया। रास्ता, बिजली, पानी वाले रूटीन काम तो कोईभी सरकार करलेगी। दंड देने वाले समर्थकों को भले ही नेताओं को पाठ सिखानेका संतोष प्राप्त हुआ हो, वे नेता तो राजनीति के गुणा भाग का हिसाब लगा कर अपनी स्थिति को सम्हाल लेंगे मगर राजनीतिक सहूलियत के लिए वे अब दूरगामी हिन्दू हितों के कामों को  ठंडे बक्से मे डाल देंगे। खैर, ऐसे कामों से भावी पीढ़ी लाभान्वित होने वाली है उसकी परवाह आजकी पीढ़ी क्यों करे ? कल किसने देखा है ?  

Monday, February 26, 2024

तथा कथित किसान आंदोलन 02 और सर्वोच्च न्यायालय का तारीख 12-01-2021 का अंतरिम आदेश।

 

आज तारीख 25 फरवरी, 2024.

सन 2021 के जनवरी मे किसान आंदोलन चरम पर था। 26 जनवारी 2021 को लाल किले पर इन तथा कथित किसानों ने हुड़दंग मचाया। इसी दौरान भारत सरकार द्वारा संसद मे पारित तीन कृषि कानूनों पर सर्वोच्च न्यायालय मे कई सारी याचिकाएं इन कानूनों के विरोधमे और इन कानूनों के पक्ष मे भी दाखिल हुई थी। तारीख 12 जनवरी, 2021 को रिट पिटीशन क्रमांक 1118/2020 राकेश वैष्णव और अन्य विरुद्ध भारत सरकार और अन्य के साथ कई अन्य याचिकाओं पर सुनवाई करते सर्वोच्च न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश पारित किया था जिसके द्वारा उन तीन कृषि कानूनों को आगेका आदेश होने तक स्थगित किया था और सरकार और किसानों के बीच संतोषकारक समाधान ढूंढने के लिए भूपिंदर सिंह मान (प्रमुख, भारतीय किसान यूनियन) की अध्यक्षता मे एक चार सदस्यी समिति का गठन किया था।

तथाकथित किसान आंदोलन के बारेमे कुछ लिखनेका मन इसलिए बना क्यों की आजकल दिल्ली के आसपास हरियाणा, पंजाब मे फिरसे तथाकथित किसानों का ‘शांतिमय विरोध प्रदर्शन’ के नाम से भारी अर्थमूवर्स जैसे की पोकलेन, जेसीबी इत्यादि मशीन, टँकनुमा ट्रेक्टर्स के साथ हुड़दंग मचाना चालू हुआ है। ऐसेमे मुजे अपनी पवित्रताम सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन कृषि कानूनों पर तारीख 12-01-2021 को दिए गए एक अंतरिम आदेश की याद या गई और उसे गूगल पर ढूंढ के पढ़ा तो मानमे कई प्रश्न उपस्थित हुए। अंतरिम आदेश शब्द को मैंने जानबूज कर हाइलाइट किया है क्यों की ये तारीख 12-01-2021 को ‘अंतरिम”  था। इस अंतरिम आदेश द्वारा गठित समिति ने अपनी ‘अंतिम’ रिपोर्ट तारीख 19 मार्च, 2021 को सर्वोच्च न्यायालय मे एक बंद लिफ़ाफ़े मे  सादर कर दी है। आज तारीख 25 फरवरी, 2024 हो गई है, तथाकथित किसानों ने फिरसे हुँड़दंग मचाना चालू कर दिया है फिर भी हमारे पवित्रतम सर्वोच्च न्यायालय का कोई अंतिम निर्णय नहीं आया है। ना ही सर्वोच्च न्यायालय ने उस रिपोर्ट को पब्लिक किया है।      

अब हम सर्वोच्च न्यायालय के उस तारीख 12-01-2021 के अंतरिम आदेश मे क्या क्या था उसकी भी थोड़ी चर्चा करेंगे क्यों की मुजे लगता है आजके पक्षपाती मीडिया के दौर मे लोगों को खुद तथ्यों को ढूंढ कर जानना चाहिए। उस अंतरिम आदेश की लिंक मै यहाँ साझा करता हूँ। आप खुद इसे पढ़ सकते हो। 

https://main.sci.gov.in/supremecourt/2020/21097/21097_2020_31_19_25372_Order_12-Jan-2021.pdf

सबसे पहेले ऊपर दी गई लिंक खोल कर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पेरा  14 पढ लीजिए जिसमे इसके ‘अंतरिम’ होनेका उल्लेख है और इसके पीछे सुप्रीम कोर्ट की आपेक्षा ये थी की कुछ न्यायसंगत समाधान निकल आएगा। अब प्रश्न ये उपस्थित होता है की क्या कुछ न्यायसंगत समाधान निकाला जैसा की सुप्रीम कोर्ट ने आपेक्षा की थी ? यदि इसका उत्तर हाँ है तो फिर किसान टँकनुमा बख्तर लगे ट्रेकटर लेकर पंजाब और हरियाणा की सड़कों पर हुड़दंग क्यों मचा रहे है ? अच्छा, और अपनी पसंद के कुछ मामलों मे स्वतः संज्ञान लेने वाली सुप्रीम कोर्ट वर्तमान मे ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ की आड़ मे हो रहे हुड़दंग का संज्ञान ले कर वो बंद लिफ़ाफ़े मे मिली अपनी ही बनाई हुई समिति की रिपोर्ट जाहीर क्यों नहीं करती ? इस प्रश्न का उत्तर तो सर्वोच्च न्यायालय से अवश्य बनाता है।  

इस अंतरिम आदेश के पेरा 6 मे भारतीय किसान यूनियन की इंटेरवेन्शन एप्लीकेशन क्रमांक : IA 3324/2021 के संदर्भ से ‘सिख फॉर जस्टिस’ नामके एक अलगाववादी संगठन द्वारा इस आंदोलन को वित्तपोषण कीये जाने के दृढ़तापूर्ण कथन (Averment) और भारत के अटार्नी जनरल द्वारा उसके समर्थन का उल्लेख तो अवश्य किया पर स्वतः संज्ञान लेने वाले सुप्रीम कोर्टको देश की एकता और अखंडता के हितमे इस दृढ़तापूर्ण कथन (Averment) पर अपनी निगरानी मे सीबीआई या एनआईए द्वारा जांच कराने के आदेश देनेकी न्यायिक

 

 

सक्रियता वाली इच्छा क्यों नहीं हुई ? यह प्रश्न भी मेरे मनमे तो उठा और किसी सामान्य नागरिक को कुतूहल वश भी इस अंतरिम आदेश को कभी पढ़ने की इच्छा हुई भी या नहीं ये मुजे नहीं पता।

       अब इस अंतरिम आदेशके पेरा 8 को देखते है। यहाँ सुप्रीम कोर्ट कहेता है, “......कृषि संगठनों और सरकार के बीच की अबतक की बातचीत से कुछ परिणाम नहीं निकाला है इस लिए हमारे विचार मे कृषि संगठनों और सरकार के बीच बातचीत करनेके लिए एक कृषिक्षेत्र के विशेषज्ञों की समिति का गठन किया जाता है इससे एक अनुकूल वातावरण की निर्मिती होगी और किसानों के विश्वास और आत्मविश्वास मे सुधार होगा। हम इस मन्तव्य के भी है कि तीनों कृषि कानूनों को हाल के लिए स्थगित कर देना किसानों की आहात भावनाओं को  शांत करेगा और किसानोनको आत्मविश्वास के साथ बातचीत की मेज पर आनेके लिए प्रोत्साहित करेगा।“  अब आज इस अंतरिम आदेश (12-01-2024) के करीब तीन साल और एक महीने बाद सुप्रीम कोर्ट के इन मंतव्यों जिनके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने तीनों कृषि कानूनों को स्थगित कर दिया और एक समिति का गठन किया उसका आजकी वास्तविक परिस्थितियों के परिपेक्ष मे मूल्यांकन करे तो फिर वही प्रश्न उठते है। सुप्रीम कोर्ट रचित समिति ने तो सरकार और करीब 85 कृषि संगठनों से बातचीत करके निर्धारित समय सीमा मे तारीख 19 मार्च, 2021 को अपनी रिपोर्ट बंद लिफ़ाफ़े मे सुप्रीम कोर्ट को सादर कर दी।  सुप्रीम कोर्ट ने यह रिपोर्ट तीन साल तक उस बंद लिफ़ाफ़े से बहार क्यों नहीं निकली ? अब किसान तो फिर फावड़ा, कुल्हाडी , टँकनुमा ट्रेक्टर्स, जेसीबी मशीनस लेकर रोड पर हुड़दंग मचाने निकाल पड़े। तो अब क्या सुप्रीम कोर्ट की कोई जवाबदेही नहीं बनती इस बात पर ? और इस बात पर सरकार से भी तो प्रश्न बनाता है की एटार्नी जनरल सुप्रीम कोर्ट से क्यों नहीं उस बंद लिफ़ाफ़े को खोलने कहेते ? अब विवादास्पद कहे जाने वाले तीनों कानूनों को तो सरकार ने वापिस ले लिया है। बाकीकी बाते तो उस बंद लिफ़ाफ़े मे है जो अपनी पवित्रतम महान सुप्रीम कोर्ट के पास है।

अब देखते है इस अंतरिम आदेशका पेरा 12. यहाँ भारतीय किसान संघ के सीनियर काउंसेल का संदर्भ देते हुए सुप्रीम कोर्टने अपने आदेश मे उल्लेख किया है की भारतीय किसान संघ के सीनियर काउंसेल जिस किसान संगठन का प्रतिनिधित्व करते है वह संगठन कृषि कानूनों से पीड़ित नहीं है। 15 राज्यों के 15 कृषि संगठनों का प्रतिनिधित्व कर रहे Consortium of Indian Farmers Association (CIFA) के काउंसेल ने प्रार्थना  की थी की अगर इस समय कृषि कानूनों के अमल को स्थगित किया जाएगा तो इन 15 राज्यों के किसानों पर बहुत बुरा असर होगा। क्यों की ये फल और सब्जियों की खेती करते है और इस समय स्थगन आदेश से 21 मिलियन टन फल और सबजिया नष्ट हो जाएंगे। यह सुन कर आदरणीय मिलॉर्डों को कोई चिंता नहीं हुई। बस इस बात का अपने आदेश मे उल्लेख मात्र कर दिया यही कृपा समजा जाना चाहिए क्यों की अभी भी अपनी सारी कार्यवाही अंग्रेजी भाषा मे करने वाली सुप्रीम कोर्ट की मानसिकता उपनिवेशवादी ही है।

करीब 12 पीटीशनर्स और कई सारे इन्टरवेन्शन याचिकाकर्ताओं को सुन कर सुप्रीम कोर्ट ने जो अंतरिम  आदेश किया है वो पेरा 14(i) से 14(iii) मे है।

पेर 14(i) : तीनों कृषि कानूनों को अगले आदेश तक स्थगित कर दिया। (इस आदेश को तीन साल हो गए है और अबतक इस पर कोई अगला आदेश होने की खवर मैंने नहीं सुनी है। और पंजाब के तथा कथित किसान फिर रोड पर उतार आए है। सरकार को निष्फल मान कर सुप्रीम कोर्ट ने एक समिति का गठन कर इस समस्या को सुलजानेका दायित्व अपने ऊपर लिया था तो अब सुप्रीम कोर्ट चुप क्यों है? )

पेर 14(ii) : तीनों कृषि कानूनों को स्थगित करने के परिणामस्वरूप ये नए कानून अस्तित्व मे आनेसे पहेले जो MSP व्यवस्था अस्तित्वमे थी वही अगला आदेश होने तक अमल मे रहेगी। अब इस आदेश को मै आपनी सामान्य बुद्धि से जैसे समजता हूँ उस हिसाब से तो सरकार एमेसपी पर किसानों से कोई बात कर ही नहीं सकती और ऐसा करना कोर्ट की अवमानना ही होगी। 12-01-2021 के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कोई अगला आदेश किया हो ऐसा तो कहीं सुना/पढ़ा नहीं है। तो फिर सरकार को इस आदेश के अनुसार पुरानी एमएसपी व्यवस्था को चालू रखना है। फिर भी खबरें यह आ रही है की किसान आंदोलन-02 के नेताओं को कृषीमंत्री और पीयूष गोयलजी एमएसपी पर अलग अलग फॉर्मूले ऑफर कर रहे है। अब तो किसान आंदोलन-02 के नेताओं को सरकार ने मात्र इतना ही कहेना चाहिए की आपकी समस्या का समाधान सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति के  लिफ़ाफ़े मे बंद रिपोर्ट मे  सुप्रीम कोर्ट के पास है। मेरी नजर मे तो सरकार अब एमएसपी पर कोई बात या निर्णय नहीं कर सकती क्यों की इस पर तो अब सुप्रीम कोर्ट को ही समिति की लएफाफेमे बंद रिपोर्ट जो उसे 19 मार्च 2021 को मिली है उसे खोल कर कुछ अंतिम निर्णय देना है।

  पेरा 14(iii) : इसमे श्री भूपिंदर सिंह मान, नेशनल प्रेसीडेंट, भारतीय किसान यूनियन की अध्यक्षता मे चार सदस्यों वाली समिति के गठन का आदेश है। और इस समिति को आदेश दिया है की वो सरकार और सारे कृषि संगठनों के प्रतिनिधिओं को सुन कर अपनी रिपोर्ट अपनी सिफारिशों के साथ कमिटी की पहेली बैठक के दो माहीनों के अंदर सुप्रीम कोर्ट को सादर करेगी और कमिटी की पहेली बैठक आजसे यानि 12-01-2021 से ठीक 10 दिन के अंदर करनी होगी।

इस पेरा 14(iii) से यह एकदम स्पष्ट हो जाता है की अब जो भी करना है वह सुप्रीम कोर्ट को ही करना है। आब इन आंदोलनकारियों को अपनी मांगों को लेकर जो भी धरना प्रदर्शन करना है वह तो सुप्रीम कोर्ट के विरुद्ध ही करना चाहिए क्यों की इस अंतरिम आदेश से इस समस्या का समाधान खोजने का दायित्व तो सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से छिन कर स्वयं अपने सर ले लिया है। और फिर इस हेतु से रचित समिति की रिपोर्ट भी तो 19 मार्च 2021 से सुप्रीम कोर्ट के पास पड़ी है।   

ये मेरे विचार है और मुजे लगता है की जागरूक नागरिकों ने सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश की बारीकियों को राष्ट्रहितमे  जानना चाहिए।

यशोधर वैद्य

राष्ट्र सर्वोपरि।       

Thursday, March 16, 2023

महाराष्ट्र शिवसेना मे फुट का संवैधानिक खटला

 

#ShivSenaCrisis

जून 2022 मे पक्ष प्रमुख उद्धव बाला साहब ठाकरे हिन्दुत्व के सिद्धांतों से भटक गए है यह कह कर अपने साथ 40 विधायक लेकर एकनाथ शिंदे पहेले सूरत और बादमे गुवाहाटी चले गए। इससे जो स्थिति उत्पन्न हुई उसमे उद्धव ठाकरे ने 30 जून 2022 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया बाद मे एकनाथ शिंदे गुट और बीजेपीने मिलके एकनाथ शिंदे के नेतृत्व मे नई सरकार बनाई जो आज आस्तित्वमे है मगर इस पूरी उठापटक मे कई संवैधानिक और कानूनी प्रश्न उपस्थित हुए और इन्ही प्रश्नों का समाधान निकालने 21 फेब्रुअरी 2023 से सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक खंडपीठ मे सुनवाई हो रही है।

आजकल ऐसी सुनवाइयों का जीवंत प्रसारण यूट्यूब चेनलों पर देखने मिल जाता है तो मै भी  इसे देखता हूँ। सुनवाई शुरू हुई तबसे आज १४ मार्च, २०२३, सुनवाई के अंतिम दिन तक, उद्धव ठाकरे के पक्ष मे मै कपिल सिब्बल और अन्य नामी वकीलों के तर्क सुन रहा हूँ। वो उनकी बात सिद्ध करने हेतु एंटी डिफेक्शन लॉ, टेन्थ शेड्यूल, नाबाम राबिया जजमेंट जैसे कईं संदर्भों का आश्रय ले रहे है उसमे कुछ आपत्तिजनक नहीं है। उसेमे से कितना प्रस्तुत है, कितना अप्रस्तुत है, क्या सही है, क्या गलत है इसमे मै नहीं जाऊंगा। मै तो पूरी सुनवाई इस लिए सुन रहा हूँ की इसमे सामान्य जनता के लिए क्या है। इस पुरी सुनवाई मे कपिल सिब्बल के तर्क सुन कर मै इतना जान पाया के जनता की भूमिका एक बार चुनाव मे वोट देनेके बाद खतम हो जाती है। और चुनाव पूरे होते ही जनता की इच्छा आपेक्षा राजकीय पक्ष के आधीन हो जाती है। उसने चुना हुवा प्रतिनिधि पार्टी अनुशासन को गिरवी रख दिया जाता है। पुरी सुनवाई मे सिब्बल महाराज यही प्रस्थापित करते रहे की आमदार यानिकी विधायक को सिर्फ वही करना है जो उसकी पार्टी चाहती है। प पू ध धु वकीलेश्वर श्री सिब्बल ने आज सुनवाई के अंतिम दिन दिया हुआ एक तर्क जो मैंने लाइव लो के ट्विटर हेंडल से लिया है, उसे नीचे उद्धृत करता हूँ जो मतदाता और उसके द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि दोनों के महत्व को शून्य कर देता है।  

Sibal : In constitutional law members of the legislatures can never be given primacy over the political party.

  https://twitter.com/LiveLawIndia/status/1636264557672038400?s=20

इसे यदि हिन्दी मे समजने का प्रयास करे तो अर्थ यह होता है की हमारी संवैधानिक विधि  मे विधानसभा के सदस्य (यानि मतदाताओं द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि) को कभी भी राजकीय पक्ष के ऊपर प्राथमिकता नही दी जा सकती यानि प्रतिनिधि वरीयता की दृष्टिसे पक्ष की तुलना मे   द्वितीय या गौण है। अब इस तर्क पर मुजे जो विचार आ रहे है वह हो सकता है की ये जो संवैधानिक खटला चल रहा था उसेमे कहीं फिट ना बैठता हो पर मेरे विचार मे देश की सामान्य जनता और मतदाताओं के विचार का विषय अवश्य होना चाहिए।

यदि हमारी संवैधानिक व्यवस्था मे प्राथमिकता पॉलिटिकल पार्टी को ही है और मतदाताओं द्वारा चुना हुआ प्रतिनिधि पार्टी का बंधक है तो फिर चुनाव मे प्रतिनिधि खड़ा ही क्यों करना है? मतदाता सीधा ही संबंधित चुनावक्षेत्र मे पार्टी चिन्ह को ही चुनेगा। और चुनावमे जोभी पार्टी चुनके आएगी वो अपने मनचाहे बंधकों को सदस्य के रूपमे विधानसभा मे भेज सकती है। उससे फायदा यह होगा की हर चुनाव क्षेत्र मे प्रतिनिधि के पीछे जो व्यक्तिगत खर्च होता है वह टाला जा सकता है। हर चुनाव क्षेत्रमे चुनाव प्रचार के लिए विविआईपी/वीआईपी प्रचारकों को जानेकी जरूरत नही रहीगी परिणामस्वरूप विविआईपी/वीआईपी के चुनावी प्रवास, उनकी सिक्योरिटी पर होने वाला बहुत बड़ा खर्च टाला जा सकता है। पार्टियों को मोटे तौर पर अपनी विचारधारा और अपने एजंडा का ही प्रचार करना रहेगा जो की विविध प्रसार माध्यमों के उपयोग द्वारा हो सकता है।  

मै अपने जीवन मे कई चुनाव देख चुका हूँ। ऐसे चुनावों मे मैंने कई मतदाताओं को यह कहते हुए सुना है की सिर्फ पार्टी मत देखो, जनता की आशा आपेक्षाओं को सुनने समजने वाला और जनता का काम करने वाला प्रतिनिधि देख के अपना वोट दो। कपिल सिब्बल की माने तो मतदाताओं ने ऐसा सोचना अब बंद करना होगा। क्यों की भारत के माने हुए संविधान विशेषज्ञ सिब्बलजी महाराज के अनुसार आपके चुने हुए प्रतिनिधि को वो नही करना है जो आप चाहते है, उसे उतना ही पानी पीना है जितना उसकी पार्टी उसे पिलाएं।

मैंने पुरी सुनवाई के दौरान देखा की मान. मुख्यनयायमूर्ति श्री इस सुनवाई मे विद्वान वकीलों को उनके तर्कों पर कई प्रश्न पूछते थे। पर प पू ध धु सिब्बल महाराज के इस तर्क पर खंडपीठ के किसी मान.  न्यायमूर्ति के मनमे कोई प्रश्न नहीं उठा तो लगता है सिब्बल महाराज के तर्क मे कुछ तो दम होगा। और यदि ऐसा है तो फिर एकतो सामान्य जनता को यह विचार करना पड़ेगा की वो जो हमारी चुनावी व्यवस्था के बारे मे सोचती, समजती है वह सिब्बल महाराज के तर्क के परिपेक्ष मे सही है क्या ? और दूसरा हमारे चुनाव आयोग और संसद को भी सोचना पड़ेगा की यदि संवैधानिक व्यवस्था मे पार्टी का महत्व लोक प्रतिनिधि से ज्यादा है और प्रतिनिधि को कभी भी पार्टी के ऊपर प्राथमिकता नहीं दी जा सकती है तो फिर चुनावों मे प्रतिनिधि खड़ा करने की व्यवस्था अर्थहीन है और इस व्यवस्था को खतम करके सिर्फ पार्टी चिन्ह को वोट देने की व्यवस्था की जानी चाहिए। जिस देश मे ज्यादातर पॉलिटिकल पार्टियां पॉलिटिकल पार्टी न होकर प्राइवेट लिमिटेड पॉलिटिकल कंपनियां है उस देशमे सिब्बल महाराज का यह तर्क प्रजातन्त्र को कहाँ लेजाएगा वह तो देश के सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक खंडपीठ और ईश्वर ही जाने।     

    


Thursday, December 22, 2022

सन १८२३ मे भारत के विध्यालयों मे क्या पढ़ाया जाता था ?

 


       इस प्रश्न पर कभी सोचने की जरूरत ही नहीं समझी थी। पर मै जे साई दीपकजी द्वारा लिखित पुस्तक “India that is Bharat” पढ़ रहा था उसमे १७ अगस्त, १८२३ को मद्रास प्रेसिडेंसी के बेल्लारी शहर के कलेक्टर ए डी केंपबेल द्वारा उस वक्त के बेल्लारी शहर मे अस्तित्वमान शिक्षा व्यवस्था के बारेमे लिखा गया पत्र उद्धृत किया गया है जिसमे उस वक्त बेल्लारी के विध्यालयों मे क्या पढ़ाया जाता था इसका विस्तृत ब्यौरा दिया है।     

१८२३ मे भारतमे ब्रिटिश शासन स्थापित हो चुका था और उस समय ब्रिटिश लोग हमारी शिक्षा व्यवस्था को बदलने की फिराक मे थे और वे अपने इस हेतु मे सफल भी हुए। पर ब्रिटीशर्स द्वारा व्यवस्था परिवर्तन करनेसे पहेले की स्थिति के बारेमे ए डी  केंपबेल ने अपने पत्र मे लिखे तथ्यों के मुताबिक हिन्दू लड़कों की उम्र पाँच साल कि होतेही उन्हे विध्यालय भेजा जाता था। विध्यायले मे प्रवेश लेने से पहेले बच्चे को जिस विध्यायले मे शिक्षा के लिए भेजना होता था उस विध्यालय के मुख्य शिक्षक और शिक्षकों को बच्चे के माता पिता अपने घर पर आमंत्रित करते थे। श्री गणेश की छवि या प्रतिमा को सामने रख कर बच्चे के साथ सभी एक वर्तुलाकार मे बैठते थे। श्री गणेश को प्रार्थना, धूप-दीप नैवेध्य समर्पित करके बच्चे से ज्ञान का आह्वान करने वाला मंत्र पाठ करवाया जाता था। बादमे बच्चे का हाथ पकड़के शिक्षक बच्चेसे चावल मे देवता का नाम लिखवाते थे। इसके बाद माता-पिता अपनी शक्ति अनुसार शिक्षकों को भेंट देते थे और दूसरे दिनसे बच्चा विध्यालय जाना शुरू करता था। केंपबेल के पत्र अनुसार विध्यालयों मे प्रमुखरूपसे रामायण, महाभारत और भागवत के ग्रंथ पढ़ाई के लिए उपयोगमे लिए जाते थे। इसके उपरांत कुछ स्थानीय भाषाकी पुस्तकें, कुछ पुराण, व्याकरण, हल्के फुल्के मनोरंजक विषयों मे पंचतंत्र वगैरा और उत्पादक वर्ग के लोगोके बच्चों को विश्वकर्मा पुराणभी सिखाया जाता था। संदर्भित पत्र मे बहुत सारे स्थानीय भाषा के पुस्तकों के नाम दिए है जिसकी  मै यंहा पुनारावृत्ति नहीं करता।

१८२३  मतलब मुग़ल करीब करीब भारतमे अपनी पकड़ गंवा चुके थे और अंग्रेजोने देश पर अपना कबजा जमा लिया था। मध्यपूर्व के मुस्लिम आक्रांताओं की १०/१२ शतकों की क्रूरता और जबरन धर्मांतरण के बाद भी अंग्रेज भारतकी सत्ता पर स्थापित हुए तबतक भारतमे रामायण, महाभारत पढ़ाया जाता था इसका प्रमाण अंग्रेज कलेक्टर केंपबेल के पत्रमे मिल जाता है। पर अंग्रेज हमारी शिक्षा पद्धती को बदल कर हमे हमारी सांकृतिसे, हमारे मूल ग्रन्थोसे  विमुख करनेमे सफल रहे जो अब हमारे अनुभव मे आ रहा है।

अंग्रेज यंहा से चले जाए फिर भी हमारी मानसिकता सदा औपनिवेशक बनी रहे इसकी व्यवस्था उन्होंने कैसे की, ब्रिटिश पार्लियामेंट मे इसके बारेमे कैसी चर्चा होती थी इसके प्रमाणों सहित साई दीपकजी ने अपने इस पुस्तक मे विस्तृत चर्चा की है। इसके दुष्परिणाम हमारी न्याय व्यवस्था पर भी हुए है।    जो राष्ट्रवादी है और चाहते है की देश इस औपनिवेशक मानसिकता से बहार आए उन सभी ने यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।