Thursday, December 22, 2022

सन १८२३ मे भारत के विध्यालयों मे क्या पढ़ाया जाता था ?

 


       इस प्रश्न पर कभी सोचने की जरूरत ही नहीं समझी थी। पर मै जे साई दीपकजी द्वारा लिखित पुस्तक “India that is Bharat” पढ़ रहा था उसमे १७ अगस्त, १८२३ को मद्रास प्रेसिडेंसी के बेल्लारी शहर के कलेक्टर ए डी केंपबेल द्वारा उस वक्त के बेल्लारी शहर मे अस्तित्वमान शिक्षा व्यवस्था के बारेमे लिखा गया पत्र उद्धृत किया गया है जिसमे उस वक्त बेल्लारी के विध्यालयों मे क्या पढ़ाया जाता था इसका विस्तृत ब्यौरा दिया है।     

१८२३ मे भारतमे ब्रिटिश शासन स्थापित हो चुका था और उस समय ब्रिटिश लोग हमारी शिक्षा व्यवस्था को बदलने की फिराक मे थे और वे अपने इस हेतु मे सफल भी हुए। पर ब्रिटीशर्स द्वारा व्यवस्था परिवर्तन करनेसे पहेले की स्थिति के बारेमे ए डी  केंपबेल ने अपने पत्र मे लिखे तथ्यों के मुताबिक हिन्दू लड़कों की उम्र पाँच साल कि होतेही उन्हे विध्यालय भेजा जाता था। विध्यायले मे प्रवेश लेने से पहेले बच्चे को जिस विध्यायले मे शिक्षा के लिए भेजना होता था उस विध्यालय के मुख्य शिक्षक और शिक्षकों को बच्चे के माता पिता अपने घर पर आमंत्रित करते थे। श्री गणेश की छवि या प्रतिमा को सामने रख कर बच्चे के साथ सभी एक वर्तुलाकार मे बैठते थे। श्री गणेश को प्रार्थना, धूप-दीप नैवेध्य समर्पित करके बच्चे से ज्ञान का आह्वान करने वाला मंत्र पाठ करवाया जाता था। बादमे बच्चे का हाथ पकड़के शिक्षक बच्चेसे चावल मे देवता का नाम लिखवाते थे। इसके बाद माता-पिता अपनी शक्ति अनुसार शिक्षकों को भेंट देते थे और दूसरे दिनसे बच्चा विध्यालय जाना शुरू करता था। केंपबेल के पत्र अनुसार विध्यालयों मे प्रमुखरूपसे रामायण, महाभारत और भागवत के ग्रंथ पढ़ाई के लिए उपयोगमे लिए जाते थे। इसके उपरांत कुछ स्थानीय भाषाकी पुस्तकें, कुछ पुराण, व्याकरण, हल्के फुल्के मनोरंजक विषयों मे पंचतंत्र वगैरा और उत्पादक वर्ग के लोगोके बच्चों को विश्वकर्मा पुराणभी सिखाया जाता था। संदर्भित पत्र मे बहुत सारे स्थानीय भाषा के पुस्तकों के नाम दिए है जिसकी  मै यंहा पुनारावृत्ति नहीं करता।

१८२३  मतलब मुग़ल करीब करीब भारतमे अपनी पकड़ गंवा चुके थे और अंग्रेजोने देश पर अपना कबजा जमा लिया था। मध्यपूर्व के मुस्लिम आक्रांताओं की १०/१२ शतकों की क्रूरता और जबरन धर्मांतरण के बाद भी अंग्रेज भारतकी सत्ता पर स्थापित हुए तबतक भारतमे रामायण, महाभारत पढ़ाया जाता था इसका प्रमाण अंग्रेज कलेक्टर केंपबेल के पत्रमे मिल जाता है। पर अंग्रेज हमारी शिक्षा पद्धती को बदल कर हमे हमारी सांकृतिसे, हमारे मूल ग्रन्थोसे  विमुख करनेमे सफल रहे जो अब हमारे अनुभव मे आ रहा है।

अंग्रेज यंहा से चले जाए फिर भी हमारी मानसिकता सदा औपनिवेशक बनी रहे इसकी व्यवस्था उन्होंने कैसे की, ब्रिटिश पार्लियामेंट मे इसके बारेमे कैसी चर्चा होती थी इसके प्रमाणों सहित साई दीपकजी ने अपने इस पुस्तक मे विस्तृत चर्चा की है। इसके दुष्परिणाम हमारी न्याय व्यवस्था पर भी हुए है।    जो राष्ट्रवादी है और चाहते है की देश इस औपनिवेशक मानसिकता से बहार आए उन सभी ने यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।