Thursday, March 16, 2023

महाराष्ट्र शिवसेना मे फुट का संवैधानिक खटला

 

#ShivSenaCrisis

जून 2022 मे पक्ष प्रमुख उद्धव बाला साहब ठाकरे हिन्दुत्व के सिद्धांतों से भटक गए है यह कह कर अपने साथ 40 विधायक लेकर एकनाथ शिंदे पहेले सूरत और बादमे गुवाहाटी चले गए। इससे जो स्थिति उत्पन्न हुई उसमे उद्धव ठाकरे ने 30 जून 2022 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया बाद मे एकनाथ शिंदे गुट और बीजेपीने मिलके एकनाथ शिंदे के नेतृत्व मे नई सरकार बनाई जो आज आस्तित्वमे है मगर इस पूरी उठापटक मे कई संवैधानिक और कानूनी प्रश्न उपस्थित हुए और इन्ही प्रश्नों का समाधान निकालने 21 फेब्रुअरी 2023 से सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक खंडपीठ मे सुनवाई हो रही है।

आजकल ऐसी सुनवाइयों का जीवंत प्रसारण यूट्यूब चेनलों पर देखने मिल जाता है तो मै भी  इसे देखता हूँ। सुनवाई शुरू हुई तबसे आज १४ मार्च, २०२३, सुनवाई के अंतिम दिन तक, उद्धव ठाकरे के पक्ष मे मै कपिल सिब्बल और अन्य नामी वकीलों के तर्क सुन रहा हूँ। वो उनकी बात सिद्ध करने हेतु एंटी डिफेक्शन लॉ, टेन्थ शेड्यूल, नाबाम राबिया जजमेंट जैसे कईं संदर्भों का आश्रय ले रहे है उसमे कुछ आपत्तिजनक नहीं है। उसेमे से कितना प्रस्तुत है, कितना अप्रस्तुत है, क्या सही है, क्या गलत है इसमे मै नहीं जाऊंगा। मै तो पूरी सुनवाई इस लिए सुन रहा हूँ की इसमे सामान्य जनता के लिए क्या है। इस पुरी सुनवाई मे कपिल सिब्बल के तर्क सुन कर मै इतना जान पाया के जनता की भूमिका एक बार चुनाव मे वोट देनेके बाद खतम हो जाती है। और चुनाव पूरे होते ही जनता की इच्छा आपेक्षा राजकीय पक्ष के आधीन हो जाती है। उसने चुना हुवा प्रतिनिधि पार्टी अनुशासन को गिरवी रख दिया जाता है। पुरी सुनवाई मे सिब्बल महाराज यही प्रस्थापित करते रहे की आमदार यानिकी विधायक को सिर्फ वही करना है जो उसकी पार्टी चाहती है। प पू ध धु वकीलेश्वर श्री सिब्बल ने आज सुनवाई के अंतिम दिन दिया हुआ एक तर्क जो मैंने लाइव लो के ट्विटर हेंडल से लिया है, उसे नीचे उद्धृत करता हूँ जो मतदाता और उसके द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि दोनों के महत्व को शून्य कर देता है।  

Sibal : In constitutional law members of the legislatures can never be given primacy over the political party.

  https://twitter.com/LiveLawIndia/status/1636264557672038400?s=20

इसे यदि हिन्दी मे समजने का प्रयास करे तो अर्थ यह होता है की हमारी संवैधानिक विधि  मे विधानसभा के सदस्य (यानि मतदाताओं द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि) को कभी भी राजकीय पक्ष के ऊपर प्राथमिकता नही दी जा सकती यानि प्रतिनिधि वरीयता की दृष्टिसे पक्ष की तुलना मे   द्वितीय या गौण है। अब इस तर्क पर मुजे जो विचार आ रहे है वह हो सकता है की ये जो संवैधानिक खटला चल रहा था उसेमे कहीं फिट ना बैठता हो पर मेरे विचार मे देश की सामान्य जनता और मतदाताओं के विचार का विषय अवश्य होना चाहिए।

यदि हमारी संवैधानिक व्यवस्था मे प्राथमिकता पॉलिटिकल पार्टी को ही है और मतदाताओं द्वारा चुना हुआ प्रतिनिधि पार्टी का बंधक है तो फिर चुनाव मे प्रतिनिधि खड़ा ही क्यों करना है? मतदाता सीधा ही संबंधित चुनावक्षेत्र मे पार्टी चिन्ह को ही चुनेगा। और चुनावमे जोभी पार्टी चुनके आएगी वो अपने मनचाहे बंधकों को सदस्य के रूपमे विधानसभा मे भेज सकती है। उससे फायदा यह होगा की हर चुनाव क्षेत्र मे प्रतिनिधि के पीछे जो व्यक्तिगत खर्च होता है वह टाला जा सकता है। हर चुनाव क्षेत्रमे चुनाव प्रचार के लिए विविआईपी/वीआईपी प्रचारकों को जानेकी जरूरत नही रहीगी परिणामस्वरूप विविआईपी/वीआईपी के चुनावी प्रवास, उनकी सिक्योरिटी पर होने वाला बहुत बड़ा खर्च टाला जा सकता है। पार्टियों को मोटे तौर पर अपनी विचारधारा और अपने एजंडा का ही प्रचार करना रहेगा जो की विविध प्रसार माध्यमों के उपयोग द्वारा हो सकता है।  

मै अपने जीवन मे कई चुनाव देख चुका हूँ। ऐसे चुनावों मे मैंने कई मतदाताओं को यह कहते हुए सुना है की सिर्फ पार्टी मत देखो, जनता की आशा आपेक्षाओं को सुनने समजने वाला और जनता का काम करने वाला प्रतिनिधि देख के अपना वोट दो। कपिल सिब्बल की माने तो मतदाताओं ने ऐसा सोचना अब बंद करना होगा। क्यों की भारत के माने हुए संविधान विशेषज्ञ सिब्बलजी महाराज के अनुसार आपके चुने हुए प्रतिनिधि को वो नही करना है जो आप चाहते है, उसे उतना ही पानी पीना है जितना उसकी पार्टी उसे पिलाएं।

मैंने पुरी सुनवाई के दौरान देखा की मान. मुख्यनयायमूर्ति श्री इस सुनवाई मे विद्वान वकीलों को उनके तर्कों पर कई प्रश्न पूछते थे। पर प पू ध धु सिब्बल महाराज के इस तर्क पर खंडपीठ के किसी मान.  न्यायमूर्ति के मनमे कोई प्रश्न नहीं उठा तो लगता है सिब्बल महाराज के तर्क मे कुछ तो दम होगा। और यदि ऐसा है तो फिर एकतो सामान्य जनता को यह विचार करना पड़ेगा की वो जो हमारी चुनावी व्यवस्था के बारे मे सोचती, समजती है वह सिब्बल महाराज के तर्क के परिपेक्ष मे सही है क्या ? और दूसरा हमारे चुनाव आयोग और संसद को भी सोचना पड़ेगा की यदि संवैधानिक व्यवस्था मे पार्टी का महत्व लोक प्रतिनिधि से ज्यादा है और प्रतिनिधि को कभी भी पार्टी के ऊपर प्राथमिकता नहीं दी जा सकती है तो फिर चुनावों मे प्रतिनिधि खड़ा करने की व्यवस्था अर्थहीन है और इस व्यवस्था को खतम करके सिर्फ पार्टी चिन्ह को वोट देने की व्यवस्था की जानी चाहिए। जिस देश मे ज्यादातर पॉलिटिकल पार्टियां पॉलिटिकल पार्टी न होकर प्राइवेट लिमिटेड पॉलिटिकल कंपनियां है उस देशमे सिब्बल महाराज का यह तर्क प्रजातन्त्र को कहाँ लेजाएगा वह तो देश के सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक खंडपीठ और ईश्वर ही जाने।