सोनम वांगचुक लद्दाख के लिए
मुख्यतः चार मांगों को लेकर एक आंदोलन चला रहे है। यद्यपि सरकार द्वारा उनसे
डिसेम्बर मे बातचीत के लिए दिए गए आश्वासन
के बाद फिलहाल वे अनशन छोड़ कर वापस चले गए है। उनकी मांगे इस प्रकार है (१) लद्दाख
को राज्य का दरज्जा (२) लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची मे रखना यानि लद्दाख को
ट्राइबल स्टेटस देना (३) स्थानिकों के लिए रोजगार के अवसर प्रदान करना और (४)
लद्दाख के लिए एक और संसदीय सीट बढ़ाने की मांग।
मेरी दृष्टि मे लद्दाख को राज्य का दरज्जा देने की मांग, रोजगार
के अवसर की मांग और संसदीय सीट बढ़ाने की मांग योग्य है उसमे कुछ बहोत हानिकारक
नहीं लगता। राज्य को छठी अनुसूची मे रखने की मांग पर गंभीरता से विचार की आवश्यकता
है। ट्राइबल स्टेटस देकर रोजगार के अवसर देना कितना सहज सरल होगा यह भी सोचने वाली
बात है क्यों की विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के बिना रोजगार के अवसर निर्माण नहीं
हो सकते और ट्राइबल स्टेटस जलवायु संरक्षण के नामसे किसी भी विकास योजना को बाधित करने
के लिए पर्याप्त कारण बन सकता है। सोनम वांगचुक एक बहुत ही सच्चे अच्छे व्यक्ति हो
सकते है। हो सकता है उनके द्वारा कीये गए बहुत सारे कार्य बहुत ही अच्छे हो। पर ये
इस बात की गारंटी नहीं है के वे जो भी करते है सब सही और अच्छा ही हो। यह तर्क
मात्र सोनम वांगचुक के लिए ही नहीं है, कोई चाहे कहीं भी उपयोग कर सकता है शर्त
इतनी ही है की वह प्रमाणों के साथ हो। एक अच्छा, सच्चा व्यक्ति अनचाहे और अंजानेमे
ही किसी विदेशी संस्था का टूल बन गया हो इस संभावना को पूर्णतया नकारा नहीं जा
सकता। ऐसा है या नहीं इसकी जांच पड़ताल करने के साधन किसीभी देश मे मात्र सरकार के
पास ही होते है और इस विषय मे सामान्य नागरिक को सरकार पर ही विश्वास करना पड़ता है।
रेमोन मेगसेसे अवॉर्ड विजेता जलवायु कार्यकर्ता
सोनम वांगचुक और लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन, लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमक्रैटिक अलाइअन्स
जैसे संगठनों द्वारा आयोजीत इस आंदोलन को समजने के लिए रेमोन मॅगसेसे कौन थे और
किस देश से थे, उनके नाम पर अवॉर्ड किस देश ने और उस देश की किन संस्थाओं ने
स्थापित किया उस इतिहास को जानना आवश्यक है। साथ साथ भारतीय संविधान की छठी
अनुसूची क्या है, किसी राज्य या प्रदेश को इस सूची मे रखने के परिणाम क्या हो सकते
है, खास करके ऐसा राज्य या प्रदेश जिसकी सीमा चीन जैसे दुश्मन देश की सीमा से जुड़ी
हो, यह जानना और समझना भी जरूरी है। इसके उपरांत लद्दाख की सीमा से लगे चीन के प्रदेश
तिब्बत मे चीन धड़ल्ले से और तेज गति से जो विकास कर रहा है वो और उससे होने वाले जलवायु
प्रदूषण को जानने और समझने की भी जरूरत है।
रेमोन
मेगसेसे अवॉर्ड
रेमोन
मेगसेसे फिलिपाइन्स के प्रेसीडेंट थे। 1940-1950 के दरमियान फिलिपाइन्स मे भूमिहीन
किसानों की जमींदारों के विरुद्ध एक कॉम्युनिस्ट गुरिल्ला मूवमेंट चल रही थी। इस
मूवमेंट को कुचलने के लिए अमरीकी सीआईए ने 1953 मे रेमोन मेगसेसे को फिलिपाइन्स के
प्रेसीडेंट का चुनाव जितवा कर सत्ता पर प्रस्थापित करवाया। और 1957 मे रेमोन
मेगसेसे एक विमान दुर्घटना मे मारे गए। उनकी स्मृति मे न्यूयॉर्क स्थित रोकफ़ेलर
ब्रदर्स फंड ने रेमोन मेगसेसे अवॉर्ड की स्थापना कि। बाद मे सन 2000 मे फोर्ड
फाउंडेशन ने ‘रेमोन मेगसेसे इमर्जेंट लीडरशिप अवॉर्ड’ की स्थापना की। ये दोनों ही
संस्थाएं अमेरिकन है। रेमोन मेगसेसे फिलीपीन्स के थे। ये दोनों अमेरिकी संस्थाएं
विदेशों मे अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए काम करने के लिए जानी जाती है। शृंखला
के बिन्दु जोड़ने से इतना तो पता चल ही जाता है की रेमोन मेगसेसे अवॉर्ड के पीछे दो
अमेरिकी संस्थाएं, रोकफ़ेलर ब्रदर्स फंड और फोर्ड फाउंडेशन है और इन दो संस्थाओं के
पीछे अमेरिकी जासूसी संस्था सीआईए है। तो मै एक सजग नागरिक के नाते ऐसा अवश्य
सोचूँगा की अच्छे हेतु की चाशनी मे लपेट कर रेमोन मेगसेसे अवॉर्ड मूलतः अमेरिकन
हितों की रक्षा के हेतु ही दिया जाता है। फोर्ड फाउंडेशन और सीआईए के संबंधों के
विषय मे ब्रिटिश पत्रकार
और इतिहासकार Frances Stonor
Saunders की पुस्तक Who Paid the
Piper ? CIA and The Cultural Cold War पर्याप्त प्रमाण है। जो पाठक सीआईए और फोर्ड फाउंडेशन
के विषय मे वास्तव मे प्रमाण देखना चाहते है उनके लिए बिंगहमटन यूनिवर्सिटी के सोशयोलॉजी
के रिटायर्ड प्रोफेसर के 2001 के आर्टिकले की लिंक यंहा देता हूँ। पढिए। https://www.ratical.org/ratville/CAH/FordFandCIA.pdf मेगसेसे अवॉर्ड
के पीछे कैसे सीआईए और अमेरिकन हितों की रक्षा का हेतु है यह समझने के लिए इतनी सामग्री
पर्याप्त है।
किसी राज्य या प्रदेश को संविधान
की छठी अनुसूची मे रखने के नकारात्मक परिणाम क्या होते है ?
वर्तमान मे भारत के चार राज्य असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम छठी
अनुसूची मे है। इसके प्रावधान भारतीय संविधान मे स्थापित सिद्धांतों से विपरीत है।
किसी राज्य या प्रदेश को छठी अनुसूची मे रखानेसे उसे ट्राइबल स्टेटस मिलता है। पर इसका
एक परिणाम यह भी होता है की एससे संविधान के समानता के मूलभूत अधिकार (अनुच्छेद 14)
का उलँघन होता है। इससे आदिवासी और गैर आदिवासी के बीच भेदभाव होता है जो अनुच्छेद
15 का उलँघन है। अनुच्छेद 19 हर भारतीय को भारत मे कहीं भी निवास करनेका, रोजगार प्राप्त
करनेका अधिकार देता है। प्रदेश को ट्राइबल स्टेटस मिलानेसे अन्य राज्य/प्रदश के निवासियों
का यह अधिकार भी छिन जाता है। जो राज्य छठी अनुसूची के अन्तर्गत है वहाँ यह स्टेटस
आदिवासी और गैर आदिवासीयों के बीच लंबे संघर्ष और दंगों का कारण रहा है। मेघालय के
1972 और 2011 के जनगणना के आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है की मेघालय मे गैर आदिवासियों
की जनसंख्या मे गिरावट आई है। 1972 मे मेघालय मे गैर आदिवासी 20 प्रतिशत थे जो 2011
मे घट कर 14 प्रतिशत हो गए। छठी अनुसूची के कारण जिला प्रशासन और स्थानिक इकाइयों को
ज्यादा स्वायत्तता मिलती है जिसके कारण विधान सभा और जिला प्रशासन के बीच टकराव की
स्थिति बनी रहती है। छठी अनुसूची के अंतर्गत जिला परिषदे भूमि और वन संबंधी अपने कायदे
बना सकती है। ऐसी स्वायत्तता राज्य और केंद्र सरकार को आंतरराष्ट्रीय सीमा पर वयहात्मक
दृष्टि से जो विकास करना आवश्यक है उसमे बाधा बन सकती है। इन सभी बातों को अनदेखा करके
लदाख को छठी अनुसूची मे रखने की मांग को स्वीकार करना राष्ट्रीय सुरक्षा को हानिकारक
हो सकता है।
विकास की
गतिविधियों से जलवायु प्रदूषण और चीन द्वारा लदाख सीमा से लगे चीन नियंत्रित प्रदेश
मे धड़ल्ले से हो रहा विकास।
लदाख की सीमा को लगा कर पूर्व मे चाइनीझ तिब्बत आटोनॉमस रिजियन और
अक्साइ चीन है। चीन अपनी 1999 की ‘Go waste campaign’ नीति के अंतर्गत तिब्बत मे धड़ल्ले से और तेज गतिसे विकास कर
रहा है। इस चीनी विकास से भी तो प्रदूषण होता होगा, ग्लेसियर्स पिघलते होंगे। लदाख
के उस पार चीन द्वारा हो रहे विकास की तुलनामे भारत तो अभी शुरुआत कर रहा है। और ऐसी
कोई व्यवस्था है क्या की जिसके कारण चीनी विकास के फल स्वरूप हो रहा प्रदूषण भारतीय
सीमा मे स्थित लद्दाख मे जलवायु प्रदूषण से कोई नुकसान ना कर पाए ? जलवायु प्रदूषण
को दूसरों की सीमा मे प्रवेश के लिए वीजा की जरूरत होती है क्या ? क्या हम ऐसा स्टेंड
ले सकते है की चीन अपनी तरफ भले ही कुछ भी करता रहे, उससे जो भी जलवायु प्रदूषण होना
है होता रहे, हम संत बने रहेंगे ?
अब तिब्बत मे चीन के विकास की गति को देख लेते है। 1959 मे तिब्बत
मे टोटल रोड नेटवर्क 7300 की मी था, जो 2022 तक बढ़ कर 1,20,000 की मी हो गया। चीन की
दसवी पंचवर्षीय योजना मे तिब्बत मे इन्फ्रस्ट्रक्चर डेवलपमेंट के 117 प्रोजेक्ट्स के
लिए 4.2 बिलियन डोलर्स इन्वेस्ट कीये थे। ग्यारहावी पंचवर्षीय योजना मे 188 इन्फ्रस्ट्रक्चर
डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के विकास के लिए 21 लाख बिलियन डोलर्स इन्वेस्ट कीये थे। वर्तमान
मे चालू चौदहवी पंचवर्षीय योजना मे 2021 से 2025 की अवधि मे तिब्बत मे इन्फ्रस्ट्रक्चर
डिवेलपमेन्ट के लिए अंदाजन 30 बिलियन डोलर्स खर्च करने का निश्चय किया है। इसके उपरांत
दक्षिण जिनजियांग और तिब्बत मे 12 कार्यरत एयरपोर्ट के आलाव और 30 नए एयरपोर्ट विकसित
करने की चीन की योजना है। तिब्बत मे 628 गाँव विकसित करने की योजना है। इन आंकड़ों का
सोर्स सेंटेर फॉर जॉइन्ट वॉरफेर स्टडीस की वेबसाइट पर प्रसिद्ध कर्नल विवेक सिंघ का
आर्टिकल है जिसकी लिंक संदर्भ हेतु यहाँ शेर करता हूँ। https://cenjows.in/chinas-infrastructure-development-along-the-line-of-actual-control-lac-and-implications-for-india/
भारत सरकार और हर भारतीय नागरिक ने इस विषय पर इमोशनली नहीं पर लॉजिकाली
और स्ट्रेटेजीकली विचार करना होगा।
यशोधर वैद्य
25-10-2024