Tuesday, February 11, 2020

दिल्ली चुनाव 2020 : मेरे कुछ विचार, कुछ आशंकाएं।

जबभी चुनाव परिणाम आते है हार-जीत के कारणों का विश्लेषण अवश्य होता है पर प्रसार माध्यमों मे क्यों कि उन्ही मुद्दों की चर्चा होती है जीन पर प्रसार माध्यम, राजकीय नेता और समाज का एक विशिष्ट वर्ग जिसे अंग्रेजी मे elite कहते है वो बल देना चाहते है और राष्ट्र पर दूरगामी परिणाम करने वाले कुछ मुद्दे अछूते ही रहे जाते है।
इस पूर्वभमिका के बाद मेरे मनमे उठ रहे कुछ प्रश्न, कुछ आशंकाएं, कुछ मुद्दे :
फ्री बिजली, फ्री पानी,  फ्री बसका सफर इत्यादि
राजकीय पक्ष तो चुनाव जितने के लिए यह सब फ्री देनेका वचन भी देते है और सत्ता मे आकर फ्री भी कर देते है। पर मेरे मनमे प्रश्न उठते है कि क्या मतदाता इस बात का विचार करता होगा कि सरकार को बिजली का उत्पादन और वितरण खर्च लगता है और वह सरकार कहाँ से निकालेगी ? वैसे ही बस चलाने का, पानी आपके घरों तक पहुंचाने का खर्च तो लगता है। और सरकार यह सारे खर्च उसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष टेक्स से जो आय होती है उसीसे करती है। और प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष कर हमारी यानी जनता की जेबसे ही सरकार के पास जाता है। तो वास्तव मे तो यह फ्री देने वाली सरकारें एनेस्थीसिया की असर मे आपकी जेबसे टेक्स के रूपमे पैसे निकाल लेती है और उसी पैसे से बिजली, पानी फ्री देनेके भ्रम मे आपको रखती है। इस मुद्दे पर आम आदमी पार्टी का तर्क है कि इन सारी व्यवस्थाओं को भ्रष्टाचार से मुक्त करदिया जाए तो यह सम्भव है। इस मुद्दे को यदि मान भी लें तो सरकारों ने इसे सस्ता देने का वचन देना चाहिए, मुफ्त क्यों ? कम से कम इन सारी व्यवस्थाओं को निभाने के लिए जो खर्च लगता है वो सभी के लिए माफ क्यों होना चाहिए यह मेरी समज मे नही आता। हां, एक सीमित गरीब तबके के लिए किया जाए इस पर कोई आपत्ति नही हो सकती। अभी चर्चा मे यहभी आ रहा है कि दिल्ली सरकार के बजट मे पैसे सरप्लस है। तो ऐसे मे अच्छा यह होगा कि इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के पीछे ज्यादा ध्यान दिया जाए। और क्यों कि कंही न कंही मेसेज यह जा रहा है कि फ्री वाली ऑफर चुनाव जीताती है तो इसका दूसरे राज्यों मे भी अनुकरण होगा और दूसरे राज्यों का बजट सरप्लस ना भी हो। सारे राज्यों की आर्थिक स्थिति एक जैसी तो नही हो सकती। दिल्ली राजधानी होने की वजहसे उसे केंद्र की तरफ से कोई विशेष अनुदान मिलता है क्या ? यह भी प्रश्न उठता है। यदि ऐसा है तो दूसरे राज्य इसका अनुकरण नही कर सकते।
एक राष्ट्रीय पक्ष के सामने राष्ट्रीय विपक्ष का अभाव
बीजेपी का जैसे जैसे एक राष्ट्रीय पक्ष के रूपमे उदय होता गया उसीके साथ साथ कोंग्रेस जो एक मात्र दूसरा राष्ट्रीय पक्ष था वह सिमटता जा रहा है और स्थिति यह बन रही है कि एक राष्ट्रीय पक्ष और अनेक क्षेत्रीय पक्ष और अपने अपने क्षेत्र और अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के बारेमे ही सिर्फ विचार करने वाले क्षत्रिय क्षत्रप। कोंग्रेस एक परिवार की प्राइवेट लिमिटेड पोलिटिकल कम्पनी बनके रहे गयी है और इसी लिए मै भी भारत ऐसी कोंग्रेस से मुक्त हो ऐसा ही चाहता हूं। लेकिन इसे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य मे देखूं तो यह स्थिति राष्ट्रहित मे बिल्कुल नही है। हां, हो सकता है कि यह दो पक्ष पद्धति की और अग्रसर हो रहे काल के पहले का पीड़ादायक संक्रमण काल हो। यदि ऐसा है तो भारतका भविष्य निश्चित ही उज्वल है। पर वर्तमान में एक राष्ट्रीय पक्ष के सामने राष्ट्रीय विपक्ष के अभाव के कारण संविधान निर्माताओं ने जिस प्रकारकी quasi federal  यानी कि अर्ध संघीय व्यवस्था का हमारे संविधान मे विचार किया है वह व्यवस्था गड़बड़ाने की संभावनाएं बढ़ जाती है और इसका प्रत्यक्ष उदाहरण नागरिकता संशोधन कानून 2019 है जो संवैधानिक रूपसे पूर्णतः केंद्र की सत्ता का विषय है पर देश के कई राज्यो के मुख्यमंत्रियों ने इसे अपने राज्यमे लागू करनेसे मना किया है हालांकि उनका यह स्टैंड गैर संवैधानिक है पर अपने क्षेत्र के किसी विशेष समुदायक़ी मत बैंक को लक्षमे रखते हुए और सारी की सारी सामान्य जनता कोई संविधान की जानकारी वाली नही होती इस शक्यता को ध्यानमे रख कर अपने क्षेत्रमे अपनी सत्ता को बनाये रखने और मजबूत करने के दांव खेले जा रहे है और यह ऐसा इसलिए सम्भव हो रहा है क्यों कि एक राष्ट्रीय दृष्टिकोण वाल विपक्ष देशमे नही है। यदि इस समय बीजेपी के सामने कोई मजबूत राष्ट्रीय विपक्ष होता तो केंद्र की सत्ताको कमजोर करने वाली कोई चुनावी रणनीत वह नही अपनाता क्यों कि कभी न कभी उसे भी केंद्रीय सत्तामें स्थापित होना होता है। हमारी संविधान सभा के बहोत सारे सदस्य जिसमे कोंग्रेस का प्राधान्य था उनकी परिकल्पना मे हमने जिस प्रकारकी संसदीय और कार्यकारणी प्रणाली का चयन किया है उसके लिए द्विपक्षीय पद्धति को वे ज्यादा उचित समजते थे और भविष्यमे ऐसा होगा ऐसी अवधारणा पर चले थे। कन्हैयालाल मुंशी जो कि हमारी संविधान सभा के प्रमुख सदस्यों में से एक थे उन्होंने अपनी किताब Indian Constitution : Pilgrimage to Freedom मे इसका स्पष्ट उल्लेख किया है। जब हमारा संविधान लिखा गया और प्रयोग मे आया तब तो कोंग्रेस का एकपक्षीय वर्चस्व था और इसी कारण से शायद उन्होंने यह सोचा होगा कि देश धीरे धीरे द्विपक्षीय पद्धति की और अग्रसर होगा और समय के चलते एक स्वस्थ प्रजातांत्रिक प्रणाली देशमे विकसित हो जाएगी। पर ऐसा शायद नही हुआ है और केंद्रीय कक्षा पर एक राष्ट्रीय पक्ष और राज्यों के स्तर पर संकुचित प्रादेशवाद से पीड़ित अनेक प्रादेशिक पक्ष ऐसी असंतुलित और राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से चिंताजनक स्थित निर्माण हो गई है। हमारे राजकीय नेताओं और प्रसार माध्यमों को राष्ट्र हित मे विवेकबुद्धि प्राप्त हो और हमारे राष्ट्रकी एकता अखंडता को कभी भी आंच न आये ऐसी प्रार्थना के साथ आपने विचारों को विराम देता हुं।

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