Thursday, June 6, 2024

हिंदुत्ववादी राजकीय पक्ष के हिंदुत्ववादी विकल्प की अनुपस्थिति मे एकमात्र उपलब्ध विकल्प को दंडित करनेका मतदाताओं का मूड और उसके दूरगामी परिणाम।

 

        २०२४ के लोकसभा चुनाव अभी अभी सम्पन्न हुए है और इस चुनाव मे एनडीए ४०० पार और बीजेपी स्वतंत्र रूपसे ३७० पार का लक्षयांक भी था और आपेक्षा भी थी। हालांकि परिणाम लक्षयांक और आपेक्षा से बहुत काम आया। हर चुनाव के बाद परिणामों का पोस्टमॉर्टम होता है की ऐसे परिणाम क्यों आए ? जो भी और जैसे भी परिणाम आते है उसके पीछे कई कारण होते है उसमे सत्य, तथ्य, अर्धसत्य, आभासी सत्य और जूठ सबकुछ होता है। पर इस मंथन से कुछ बातें उभर कर सामने आती है जो अच्छे बुरे परिणामों के लिए कारणीभूत मानी जाती है।

       अभी सम्पन्न हुए चुनावों मे जो बीजेपी को घाटा हुआ है उस पर अब हो रहे मंथनमे जो खास  कारण सामने आते है वे मुख्यतः तिकीटों के बटवारे को लेकर कार्यकर्ताओं मे नाराजी, गरमी और शादी ब्याह की सीझन के कारण खासकर हिन्दू मतदाताओं का मत देने नही जाना, मतदान दिवस के लिए सोमवार शुक्रवार के चयन के कारण मौज मस्ती मे रहेने वाले हिन्दू मतदाताओं की मतदान के प्रति उदासीनता वगैरा वगैरा। इसके उपरांत कई और कारण भी होंगे और हो सकते है।

       जब कोई राजकीय पक्ष अपने समर्थक मतदाताओं की आपेक्षाओं पर खरा नही उतरता तब जनतंत्र मे मतदाता को अपने मत की शक्ति से उसे दंडित करने का पूरा अधिकार है। पर भारत जैसे जनतंत्र मे शर्त यह है की उसके पास उसकी धार्मिक सांस्कृतिक विचारधारा को अक्षुण रखकर उसकी आपेक्षा पुरी करने वाला दूसरा विकल्प उसके पास हो। कुछ समय पहेले मैने शिवसेना को ऐसे विकल्प के रूपमे उभरनेकी आशा की थी। पर हिंदुओं के दुर्भाग्यसे शिवसेनामे ऐसे दुरदृष्टा नेतृत्व के अभावमे पक्ष मात्र परिवारवादी आकांक्षाएं और प्रदेशवाद मे सिमट कर रहे गया। अब हिंदुत्ववादी हिन्दू मतदाता के लिए समस्या यह है की उसके पास बीजेपी को छोड़कर दूसरे हिंदुत्ववादी राष्ट्रीय पक्ष का विकल्प उपलब्ध नही है। ऐसे मे वो जब उचित/अनुचित किसी भी कारणवश अपने पास उपलब्ध एक मात्र विकल्प को दंडित करता है तब वह स्वयं को भी उस दंड का भोगी बना लेता है और विरोधी ताकतों को अनचाहे ही प्रबल बना देता है। बीजेपी के समर्थक मतदाताओं मे से कुछ मतदाताओं की और कुछ कार्यकर्ताओं की उनकी अपनी कुछ आपेक्षा भंग, नाराजी के कारण बीजेपी और उसके नेतृत्वको दंडित करने की धुनने बीजेपी और उसके नेतृत्व के प्रभाव को सीमित कर दिया है। मै कुछ मतदाता और कुछ कार्यकर्ता इसलिए कहे रहा हूँ क्यों की अगर सब वैसा ही करते तो बीजेपी को २४० सीटें भी नही मिलती।

       बीजेपी के हर समर्थक यानि वे भी जिन्होंने इसबार बीजेपी और उसके नेतृव का घमंड उतारने की अपनी ताकत का परिचय दीया है उनकी भी यह इच्छा प्रबल है की बीजेपी इस भारत भूमि की मूल संस्कृति, सभ्यता और धर्म को उसकी भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित करने का काम करे। और इसी दिशामे करने वाले काम ही मुश्किल है जिसे करने के लिए एक सशक्त सरकार चाहिए जो की २०१९  से २०२४ मे थी और २०२४ से २०२९ मे भी चाहिए थी। पर उसे अब बीजेपी के समर्थक वर्ग ने ही पूर्ण बहुमत न देकर गठबंधन की सीमाओं मे बांध दिया। रास्ता, बिजली, पानी वाले रूटीन काम तो कोईभी सरकार करलेगी। दंड देने वाले समर्थकों को भले ही नेताओं को पाठ सिखानेका संतोष प्राप्त हुआ हो, वे नेता तो राजनीति के गुणा भाग का हिसाब लगा कर अपनी स्थिति को सम्हाल लेंगे मगर राजनीतिक सहूलियत के लिए वे अब दूरगामी हिन्दू हितों के कामों को  ठंडे बक्से मे डाल देंगे। खैर, ऐसे कामों से भावी पीढ़ी लाभान्वित होने वाली है उसकी परवाह आजकी पीढ़ी क्यों करे ? कल किसने देखा है ?  

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