Tuesday, June 25, 2024

इमरजेंसी यानी की आपातकाल मैने देखा है।

             25 जून 1975 के दिन जब इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने भारत मे इमरजेंसी घोषित की तब मै ठीक 20 साल का था और मेरी पुलिस ट्रेनिंग के अंतिम तबके मे था। जुलाई 1975 मे मेरी तालीम पूरी हुई। एमरजेंसी भी एकदम से ताजा ताजा और हम भी एकदम से ताजा ताजा डंडा हाथमे आए पुलिस वाले। हम गुजरात के भावनगर जिले मे थे। उस कालखंड के हमारे उत्साही एस पी साहब की निगरानी और आदेशों के अंतर्गत हफ्ते/महीने मे एखाद बार क्रिमिनलो के गले मे उनकी क्राइम हैबिट्स की तख्तियां लटका कर शहर की सड़कों पर उनका जुलूस निकाला करते थे। सच कहूं तो तब मुझे इमरजेंसी बहुत अच्छी लगी थी। सत्ता का एक अवर्णनीय नशीला सा आनंद मिलता था। डेमोक्रेसी जैसे शब्द मस्तिष्क से मिलों दूर थे। ये तो हुई मेरी बात। पर साधारण जन समुदाय भी खुश था क्यों की MISA (Maintenance of Security Act) जैसे कठोर कानून, पुलिस और सत्ता के डर से एक डिसिप्लिन का माहौल बना था। आम तौर पर लेट चलने वाली रेल गाड़ियां समय से चलने लगी थी। साधारण लोगों के लिय तो यही छोटी छोटी खुशियां महत्व की थी। विजया राजे सिंधिया, जयप्रकाश नारायण, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंघ यादव, राज नारायण,  मोरारजी देसाई, ज्योर्ज फर्नांडिस, अटल बिहारी वाजपेई, लालकृष्ण आडवाणी, चौधरी चरणसिंघ, अरुण जैटली जैसे विपक्ष के बड़े बड़े नेताओं को मीसा के अंतर्गत जेल मे डाल कर संविधान के प्रिएंबल मे सेक्युलर और सोश्यालिस्ट शब्द घुसेडने को सच्ची तानाशाही कहते है ये छोटी छोटी खुशियों मे ही प्रसन्न रहने वाली साधारण जनता की समझ से परे था और आज भी पता नहीं जनता ठिकसे समझ पाई है या नही ! बीस साल की उत्साही युवावस्था मे इन सब चीजों के जनतंत्र पर होने वाले घातक परिणामों से हम भी अनभिज्ञ थे।

       आज मेरी उम्र 70 साल है। और जब पीछे मुड़ कर भूतकाल में देखता हुं तो विधि की वक्रता और कांग्रेस बीजेपी से भी बड़ी वॉशिंग मशीन है यह समझ मे आता है। अठारहवी लोकसभा की सांसद (एमपी) मीसा भारती का नाम मीसा क्यों है ? क्यों कि मिसाजी के पिताश्री लालूजी इंदिराजी की कांग्रेस द्वारा देश पर थोपी गई  इमरजेंसी के दौरान मेंटेनेंस ऑफ इंटर्नल सिक्योरिटी ऐक्ट (मिसा) के अंतर्गत जब जेल मे थे तब मिसाजी का जन्म हुआ इसलिए उनका नामकरण मीसा हुवा। अब उस कालखंड मे जो लालूजी इंदीराजी की सरकार की नजर मे भारत की आंतरिक सुरक्षा को खतरा थे वे और उनकी बेटी/बेटे कोंग्रेस के साथ जुड़कर धूल के साफ सुथरे होकर आज भारत और भारत के संविधान के रक्षक बन गए ! जो मुलायमसिंघ यादव २५ जून १९७५ ले कर २१ मार्च १९७७ के दौरान इंदिराजी की कॉंग्रेस सरकार की नजर मे देश की आन्तरिक सुरक्षा के लिए खतरा थे उनके सुपुत्र कॉंग्रेस के साथ मिलकर अच्छी तरह कॉन्ग्रेसी डिटर्जेंट से धूल कर इस नए युग मे भारत के संविधान के रक्षक बन गए है। इसे कहेते है नेरटिव यानि कथानक। ये नेरटिव गढ़ने वाले इंटेलेकचयूअल्स भीख मांगने के कटोरे को अक्षय पात्र सिद्ध करने मे माहिर होते है। एक साधारण व्यक्ति जो की देश का नागरिक और चुनाव परिणामों मे आती महत्व का घटक ऐसा मतदाता भी होता है उसके लिए सुबह उठाना, फ्रेश होकर चाय नाश्ता करके काम पर निकाल जाना, शाम को थके हारे घर लौट कर डिनर करके सो जाना इसीमे जिंदगी सिमट जाती है। अब इस सर्व साधारण व्यक्तिको अप्लीकेशन ऑफ माइन्ड जैसी प्रकृति प्राप्त शक्ति का प्रयोग कर देश दुनिया मे हो रही घटनाओंको ठिकसे समझ लेने की फुरसत नहीं है तो वो मीडिया, सोश्यल मीडिया पर उपलब्ध खरा खोटा नेरटिव चाय नाश्ता, लांच या डिनर के साथ निगल लेता है और उसका उसके मानस पर प्रभाव भी रहेता है।

        मेरे ईमर्जन्सी के अनुभव की बात करते करते मै नेरटिव की बात पर क्यों आ गया ? क्यों की जनतंत्र की तंदूरस्ती वोट के टॉनिक से अच्छी रहती है और सर्व साधारण नागरिक का वोट करने का निर्णय नेरटिव से प्रभावित होता है। वोट दोधारी तलवार है। इसीसे डिमाक्रसी पोषित होती है और कभी इसीसी से ही यानि वोट से ही इसका घात होगा। यदि डिमाक्रसी बचानी है तो साधारण व्यक्ति को ही अपनी रोजमर्रा की दिनचर्या से ऊपर उठ कर सच्चे और जूठे नेरटिव की पहचान करने के लिए अप्लीकेशन ऑफ माइन्ड यानि अपने मस्तिष्क के उपयोग का कष्ट उठाना ही होगा वरना आखिर पछताना भी तो इसी साधारण व्यक्ति को ही पड़ेगा। किसी पार्टी के आय टी सेल पर निर्भर मत रहेन। भारत मे अपना हाथ जगन्नाथ ऐसी उक्ति प्रचलित है।   

       

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